Written by : प्रमुख संवाद
कोटा, 23 अगस्त। पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी में चातुर्मासरत मुनिश्री 108 योगसागर महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के सम्यग्दर्शन अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन में ज्ञान, धन, कुल, रूप, तप और पद की उपलब्धियां बुरी नहीं हैं, लेकिन उनका अहंकार अर्थात मद आत्मिक पतन का कारण बन जाता है।
मद मनुष्य को धर्म से दूर करता है
मुनिश्री ने कहा कि मद मनुष्य को धर्म से नहीं, बल्कि धर्मात्माओं से दूर करता है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, धन, कुल, रूप, तप या प्रतिष्ठा का अभिमान करने लगता है, तब उसके भीतर विनय का क्षय होने लगता है। धीरे-धीरे यही अहंकार उसे धर्म के वास्तविक स्वरूप से विमुख कर देता है।
धर्मात्मा का सम्मान ही धर्म की विनय
मुनिश्री ने कहा कि धर्मात्मा का सम्मान करना धर्म के प्रति सम्मान प्रकट करना है। मद के कारण किसी साधर्मी का तिरस्कार करना वास्तव में अपने ही धर्म का तिरस्कार है। सम्यग्दृष्टि व्यक्ति दूसरों के गुणों को देखकर ईर्ष्या नहीं करता, बल्कि उनके गुणों से प्रसन्न होकर विनय और वात्सल्य का भाव रखता है।
ज्ञान, धन और तप में विनय जरूरी
उन्होंने कहा कि ज्ञान की सार्थकता विनय में, धन की सार्थकता सेवा में, शक्ति की सार्थकता परोपकार में और तप की सार्थकता अहंकार के क्षय में है। उपलब्धियों को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण मानने के बजाय पुण्य का परिणाम समझकर उनका सदुपयोग धर्म और समाज के हित में करना चाहिए।
धार्मिकता का अहंकार भी घातक
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को सावधान करते हुए कहा कि अहंकार बहुत सूक्ष्म रूप से मनुष्य के भीतर प्रवेश करता है। कभी ज्ञान, कभी धन, पद-प्रतिष्ठा और कभी धार्मिकता का अहंकार भी व्यक्ति को घेर सकता है। सच्चा धर्म मनुष्य को दूसरों से ऊंचा समझने की दृष्टि नहीं देता, बल्कि भीतर से जितना ऊंचा उठाता है, उतना ही विनम्र बनाता है।
अपने भीतर झांकना ही आत्मकल्याण का मार्ग
उन्होंने कहा कि दूसरों की कमियां देखने से पहले व्यक्ति को अपने भीतर झांकना चाहिए। यदि हमारे भीतर मद बढ़ रहा है तो धर्म का प्रभाव घट रहा है और यदि विनय बढ़ रही है तो समझना चाहिए कि धर्म हमारे जीवन में उतर रहा है। इसलिए प्रत्येक उपलब्धि को आत्मकल्याण का साधन बनाना चाहिए।
धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन
धर्मसभा में कलश स्थापना, शांतिधारा, श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, शास्त्र भेंट, भक्तामर विधान एवं मंगलाचरण सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन किया। मुनिश्री योगसागर एवं मुनिश्री प्रणवसागर के आहारदान का सौभाग्य भी श्रद्धालु परिवारों को प्राप्त हुआ।
मुनिश्री का अमृत संदेश
“मद घटे और विनय बढ़े, यही सम्यग्दर्शन की पहचान है।”
