Written by : Sanjay kumar
जब हजारों करोड़ का कर्ज चंद रुपयों में गायब हो जाए: कॉरपोरेट जगत का सबसे बड़ा घालमेल
नई दिल्ली: 29 अगस्त। भारतीय बैंकिंग और वित्तीय इतिहास में शायद ही कभी ऐसा उदाहरण मिला हो, जहां 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज के दावों को महज 6.5 करोड़ रुपये के टोकन भुगतान पर हमेशा के लिए रफा-दफा कर दिया गया हो। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की दिल्ली बेंच द्वारा एस्सेल समूह (Essel Group) के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामले में दिया गया हालिया फैसला देश की वित्तीय न्याय प्रणाली की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत में वित्तीय कानूनों की आड़ लेकर रसूखदार लोग जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को पानी के भाव चुकता कर कानून के शिकंजे से आसानी से बाहर निकल सकते हैं?
99.97% का ऐतिहासिक ‘हेयरकट’: क्या रसूख के दबाव में घुटने टेक दिए गए?
इतिहास के सबसे बड़े दिवालिया मामलों में शुमार इस घटनाक्रम में सुभाष चंद्रा के खिलाफ वित्तीय लेनदारों ने 22,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के दावे ठोके थे, लेकिन रीपेमेंट प्लान के तहत सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये में मामला सेटल हो गया। यह इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के इतिहास का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला ‘हेयरकट’ (करीब 99.97%) है। हैरानी इस बात की है कि इस प्रस्ताव के पक्ष में 80% से अधिक कर्जदाताओं ने वोट दिया। वित्तीय विश्लेषकों और जानकारों के बीच अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर डिफॉल्ट करने वाले प्रमोटर के रसूख, राजनीतिक पहुंच और मीडिया साम्राज्य के प्रभाव के आगे नियामक संस्थाएं और बैंक दबाव में आ गए?
सरकार और व्यवस्था की खामोशी पर उठते गंभीर सवाल: क्यों नहीं हुई आपराधिक जांच और संपत्ति कुर्क?
आम नागरिकों द्वारा एक छोटा सा बैंक लोन या होम लोन न चुकाए जाने पर बैंक और प्रशासन उनकी संपत्तियों को तुरंत कुर्क कर लेते हैं, उन पर कानूनी शिकंजा कस दिया जाता है और आपराधिक मुकदमे तक दर्ज किए जाते हैं। इसके विपरीत, हजारों करोड़ के घोटाले और डूबते कर्जों के मामलों में सरकार और केंद्रीय एजेंसियों की चुप्पी गहरी संदिग्धता पैदा करती है। सुभाष चंद्रा जैसे दिग्गजों के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) और अन्य नियामकों ने सख्त आपराधिक मामले दर्ज कर उनकी बेनामी व व्यक्तिगत संपत्तियों को क्यों नहीं अटैच किया? क्या सरकार और सिस्टम ने जानबूझकर ऐसी लूपहोल्स (कमियों) को नजरअंदाज किया ताकि कॉरपोरेट घरानों को बचाया जा सके?
पर्सनल गारंटी का ढकोसला: क्या बैंकों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच सिर्फ कागजी शेर बन गया है?
बैंकिंग नियमों के मुताबिक, जब कोई कॉरपोरेट कंपनी कर्ज लेती है, तो प्रमोटर द्वारा दी जाने वाली ‘पर्सनल गारंटी’ को सबसे मजबूत सुरक्षा कवच माना जाता है, ताकि कंपनी के डूबने पर प्रमोटर की निजी संपत्तियों को बेचकर बैंक अपने पैसे वसूल सकें। लेकिन इस मामले ने इस पूरे सुरक्षा तंत्र की धज्जियां उड़ा दी हैं। पर्सनल गारंटी को कॉरपोरेट डिफॉल्ट से अलग मानकर डील करने के कानूनी प्रावधानों का फायदा उठाते हुए सुभाष चंद्रा ने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का मात्र एक अंश यानी 6.5 करोड़ रुपये देकर अपनी संपूर्ण जवाबदेही से किनारा कर लिया। यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि कानून की किताबों में दर्ज सुरक्षा कवच केवल आम आदमी के लिए सख्त हैं, जबकि रसूखदारों के लिए यह महज एक छलावा है।
आम जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका: किसकी जेब से जा रहा है यह भारी-भरकम नुकसान?
यह समझना बेहद जरूरी है कि यह 22,000 करोड़ रुपये कोई हवा में तैरती रकम नहीं थी, बल्कि यह देश के आम नागरिकों, मध्यम वर्ग और मेहनतकश लोगों की बैंक जमा पूंजी (Deposits) थी, जिसे बैंकों ने कॉरपोरेट घरानों को ऋण के रूप में दे दिया था। जब इस तरह के कर्ज राइट-ऑफ या भारी हेयरकट के जरिए डूब जाते हैं, तो बैंकों को अपनी बैलेंस शीट सुधारने के लिए इस नुकसान की भरपाई जनता से वसूले जाने वाले ऊंचे शुल्कों, कम ब्याज दरों और सरकारी टैक्स के जरिए करनी पड़ती है। अंततः, इस वित्तीय हेरफेर का पूरा बोझ देश के आम करदाता और जमाकर्ता की जेब पर पड़ता है, जबकि डिफॉल्ट करने वाला प्रमोटर मजे से बाहर हो जाता है।
एचडीएफसी और एलआईसी का कड़ा विरोध: भविष्य के वित्तीय अनुशासन के लिए एक खतरनाक मिसाल
इस फैसले के खिलाफ एचडीएफसी बैंक, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, केनरा बैंक, एक्सिस बैंक, यूनियन बैंक और आरबीएल बैंक जैसे बड़े वित्तीय संस्थान मुखर रूप से विरोध में खड़े हैं। इन बैंकों का साफ तर्क है कि यदि हजारों करोड़ के बकाये पर प्रमोटरों से महज चंद लाख या करोड़ वसूलकर उन्हें बरी कर दिया गया, तो भविष्य में बैंकिंग सिस्टम में ‘क्रेडिट डिसिप्लिन’ (साख अनुशासन) पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। कोई भी प्रमोटर बिना किसी डर के भारी कर्ज लेगा, अपनी कंपनियों को दिवालिया घोषित करवाएगा और नाममात्र की रकम देकर कानून की गिरफ्त से साफ बच निकलेगा।
क्या देश की सर्वोच्च अदालतों और सरकार को इस पर तुरंत दखल देना होगा?
यदि समय रहते सरकार ने इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के नियमों में कड़े संशोधन नहीं किए और उच्च न्यायालयों व सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर स्वतः संज्ञान लेकर गंभीर रोक नहीं लगाई, तो यह भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। यह मामला इस बात का सबसे बड़ा एक्सक्लूसिव प्रमाण बन चुका है कि कैसे सिस्टम की कमजोरियों और रसूख के गठजोड़ से जनता के धन को चूना लगाया जा रहा है। देश की वित्तीय सुरक्षा और आर्थिक न्याय के हित में यह अनिवार्य हो गया है कि ऐसे मामलों की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो और दोषियों की व्यक्तिगत संपत्तियों को पूरी तरह कुर्क करके पाई-पाई की वसूली की जाए।
