Written by : प्रमुख संवाद
कोटा, 25 सितम्बर। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में दशलक्षण महापर्व के दशम एवं अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ की गई। इस अवसर पर मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य केवल विषय-वासनाओं से दूर रहने का नाम नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में रमण करने की साधना है।

मुनिश्री ने कहा कि इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर आत्मस्वरूप की ओर ले जाना ही ब्रह्मचर्य की सच्ची साधना है। दशलक्षण महापर्व के दसों धर्मों को केवल पर्व के दस दिनों तक सीमित न रखकर उन्हें जीवन के स्थायी संस्कार के रूप में अपनाना चाहिए।
श्रावक योग संस्कार शिविर का समापन
दशलक्षण महापर्व के साथ आयोजित श्रावक योग संस्कार शिविर का भी समापन हुआ। शिविरार्थियों ने शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र, स्वाध्याय एवं जिज्ञासा-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की। अनेक श्रद्धालुओं ने उपवास एवं एक समय शुद्ध भोजन का अनुशासन अपनाकर तप-साधना की।
अनंत चतुर्दशी के अवसर पर देव-शास्त्र-गुरु के सान्निध्य में धर्म प्रभावना जुलूस निकाला गया। दस उपवास, पंचमेरु, तेला एवं सोलह कारण व्रत सहित विभिन्न तप साधनाएं करने वाले साधकों का सम्मान किया गया। दस उपवास करने वाले साधक बग्गियों में सवार होकर धर्म प्रभावना में शामिल हुए।
शिविर निदेशक जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि दस दिनों तक चले शिविर में श्रावकों को धर्म, संयम, स्वाध्याय एवं आत्मकल्याण के संस्कारों से जोड़ा गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र, महाआरती एवं मुनिश्री के आहारदान में श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। सभी तपस्वियों एवं पुण्यार्जकों का सम्मान किया गया।
