ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल एडिक्शन: मासूम जिंदगियों पर बढ़ता खतरा

Written by : Sanjay kumar

Date: 6 Feb. 2026।

एक चेतावनी, एक अपील, एक सामूहिक जिम्मेदारी

भारत तेजी से डिजिटल युग में आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसी प्रगति की आड़ में एक खामोश संकट हमारे घरों के भीतर पनप रहा है। ऑनलाइन गेमिंग, रील्स और सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बच्चों और युवाओं के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। हाल की दर्दनाक घटनाएं इस सच्चाई को उजागर करती हैं कि डिजिटल एडिक्शन अब जानलेवा रूप ले चुका है।

दिल दहला देने वाली घटनाएं: एक चेतावनी

हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सामने आई घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, जहां 16, 14 और 12 वर्ष की तीन नाबालिग बहनों ने एक ऑनलाइन मोबाइल गेम से जुड़े कथित ‘टास्क’ के दबाव में आत्महत्या कर ली। यह घटना कोई अकेला मामला नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर कर्नाटक जैसे राज्यों में भी ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े आत्महत्या के अनेक मामले सामने आ चुके हैं। ये घटनाएं स्पष्ट संकेत हैं कि कुछ ऑनलाइन गेम्स बच्चों के मनोविज्ञान के साथ खतरनाक तरीके से खेल रहे हैं।

कैसे काम करता है गेमिंग एडिक्शन

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ऑनलाइन गेम जीतने या लेवल पूरा करने पर मस्तिष्क में डोपामिन नामक रसायन का स्राव होता है, जो खुशी और उत्साह का अनुभव कराता है। बार-बार यह अनुभव पाने की चाह धीरे-धीरे लत में बदल जाती है। हार या गेम से दूरी होने पर बच्चे चिड़चिड़े, गुस्सैल, उदास और आक्रामक हो सकते हैं। पढ़ाई, नींद, पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक व्यवहार पर इसका गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों और MRI स्कैन में यह भी सामने आया है कि गंभीर वीडियो गेमिंग एडिक्शन का प्रभाव मस्तिष्क पर लगभग वैसा ही होता है जैसा नशीले पदार्थों या शराब की लत का। निर्णय लेने की क्षमता, भावनात्मक संतुलन और जोखिम को समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है।

भारत में स्थिति कितनी गंभीर

  • भारत में करोड़ों की संख्या में सक्रिय ऑनलाइन गेमर्स हैं, जिनमें बड़ी हिस्सेदारी बच्चों और किशोरों की है।
  • Gen Z और टीनएज बच्चों का एक बड़ा वर्ग सप्ताह में कई घंटे मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया पर बिताता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के पास अब हर सप्ताह गेमिंग और डिजिटल एडिक्शन से जुड़े नए मामले सामने आ रहे हैं।
  • शोध बताते हैं कि भारत में अधिकांश मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की शुरुआत 35 वर्ष से कम उम्र में हो रही है, जिसमें स्क्रीन टाइम और डिजिटल एडिक्शन एक बड़ा कारण बनकर उभरा है।

सोशल मीडिया और रील्स एडिक्शन के दुष्प्रभाव

  • घबराहट और बेचैनी
  • अकेलापन और सामाजिक अलगाव
  • अनिद्रा और नींद संबंधी विकार
  • डिप्रेशन और आत्मविश्वास में कमी
  • वास्तविक दुनिया से कटाव
  • डिजिटल और वर्चुअल दुनिया को ही सच मानने की प्रवृत्ति

TEXT NECK सिंड्रोम और शारीरिक नुकसान

लगातार मोबाइल और लैपटॉप के उपयोग से ‘टेक्स्ट नेक सिंड्रोम’ तेजी से बढ़ रहा है, खासकर 14 से 24 वर्ष के युवाओं में। इसके प्रमुख लक्षण हैं:

  • सिरदर्द, गर्दन और कंधों में अकड़न
  • झुनझुनी और पीठ दर्द
  • आंखों में जलन, ड्राईनेस और रेडनेस
  • नजर कमजोर होना और रेटिना पर असर
  • नींद की गंभीर समस्याएं

इसके अलावा अत्यधिक स्क्रीन टाइम से मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग, नर्वस सिस्टम की दिक्कतें, स्पीच और सुनने की समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

संस्कृति और वर्चुअल पहचान का प्रभाव

कुछ ऑनलाइन गेम्स और डिजिटल कंटेंट बच्चों को एक खास वर्चुअल संस्कृति और पहचान में ढालने का प्रयास करते हैं। लगातार एक्सपोज़र के कारण बच्चे अपनी वास्तविक पहचान से कटने लगते हैं और वर्चुअल दुनिया को ही असली मान बैठते हैं। यह मानसिक भ्रम और भावनात्मक असंतुलन को और गहरा कर देता है।

समाधान क्या है: सिर्फ रोक-टोक नहीं, संवाद जरूरी

विशेषज्ञ मानते हैं कि समाधान केवल मोबाइल छीन लेने या सख्त पाबंदियों से नहीं निकलेगा। इसके लिए जरूरी है:

  • माता-पिता और बच्चों के बीच खुला और भरोसेमंद संवाद
  • बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर सतर्क लेकिन समझदारी भरी निगरानी
  • स्क्रीन टाइम की स्पष्ट और व्यावहारिक सीमा
  • खेल, कला, पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा
  • स्कूल स्तर से डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा

कुछ देशों में गेमिंग डिटॉक्स सेंटर और संरचित कोर्स शुरू किए गए हैं, जहां बच्चों को डिजिटल संतुलन सिखाया जाता है। भारत में भी ऐसी पहलों, जागरूकता अभियानों और नीतिगत प्रयासों की सख्त जरूरत है।

समाज से अपील

यह समय आंखें मूंदने का नहीं है। ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल एडिक्शन एक व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या बन चुकी है। माता-पिता, शिक्षक, स्कूल, नीति निर्माता और समाज—सभी को मिलकर बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए जिम्मेदारी निभानी होगी।

मासूम जिंदगियों को स्क्रीन के अंधेरे में खोने से बचाइए। आज की जागरूकता ही कल की सुरक्षा है।

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