Written by : Sanjay kumar
जोधपुर, 4 फरवरी
राजस्थान हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के दुरुपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी टिप्पणी करते हुए कहा है कि आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों को यांत्रिक रूप से आपराधिक श्रेणी में रखना न्यायोचित नहीं है। अदालत ने केंद्र सरकार एवं विधि निर्माताओं से आग्रह किया है कि POCSO कानून में “Close-in-Age Exception” अर्थात ‘निकट आयु अपवाद’ जैसे प्रावधान पर गंभीरता से विचार किया जाए, जिससे 16 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में आपसी सहमति से बने संबंधों को परिस्थितियों के आधार पर परखा जा सके।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने एक रिपोर्टेबल निर्णय में स्पष्ट किया कि देशभर में दर्ज POCSO मामलों का बड़ा हिस्सा ऐसे मामलों का है, जिनमें दो किशोर या किशोर-युवा आपसी सहमति से संबंध में होते हैं, लेकिन पारिवारिक अथवा सामाजिक असहमति के कारण उन्हें गंभीर आपराधिक धाराओं में फंसा दिया जाता है। इससे न केवल कानून का उद्देश्य प्रभावित होता है, बल्कि युवाओं का भविष्य भी अनावश्यक रूप से संकट में पड़ जाता है।
अदालत ने कहा कि POCSO जैसा कठोर कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है, न कि सहमति आधारित रिश्तों को अपराध घोषित करने के लिए। कानून का अंधाधुंध और यांत्रिक प्रयोग न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जयपुर ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित है, जहां वर्ष 2025 में एक 19 वर्षीय युवक के खिलाफ 17 वर्षीय लड़की को बहला-फुसलाकर ले जाने और यौन शोषण के आरोप में POCSO सहित अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद विशेष POCSO न्यायालय ने आरोप तय कर दिए, जिसके खिलाफ युवक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि लड़की ने अपनी इच्छा से घर छोड़ा था और युवक के साथ रहने के दौरान किसी भी प्रकार की जबरदस्ती, दबाव या शोषण नहीं हुआ। पीड़िता के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और ट्रायल के दौरान प्रस्तुत साक्ष्य अभियोजन के दावे का समर्थन नहीं करते थे। स्वयं पीड़िता ने युवक के विरुद्ध आरोपों से इनकार किया और वह अभियोजन पक्ष के समर्थन में नहीं रही।
हाईकोर्ट का निर्णय
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब कथित पीड़िता स्वयं अपराध से इनकार कर रही है और कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो केवल कानून की कठोरता के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने BNSS की धारा 528 के अंतर्गत अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए एफआईआर, चार्जशीट एवं संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
पुलिस और ट्रायल कोर्ट पर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली और ट्रायल कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि गंभीर धाराएं लगाते समय विवेक का प्रयोग आवश्यक है। ट्रायल कोर्ट को केवल अभियोजन का औपचारिक माध्यम न बनकर, प्रारंभिक स्तर पर ही कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकना चाहिए।
रोमियो-जूलियट अपवाद पर संकेत
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि हाल के वर्षों में उच्चतम न्यायालय सहित कई न्यायालयों ने ऐसे मामलों में उदार दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता जताई है, जहां आयु का अंतर नगण्य हो, संबंध आपसी सहमति पर आधारित हों और शोषण का कोई प्रमाण न हो। स्पष्ट कानूनी प्रावधान की अनुपस्थिति में भी न्यायालयों से अपेक्षा की गई कि वे मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएं।
यह निर्णय POCSO कानून के उद्देश्य, उसकी व्याख्या और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर एक नई और महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है।
