प्रमुख संवाद: 8 मई 2026
किडनी फेलियर, संक्रमण और मौतों ने खड़े किए बड़े सवाल
कोटा : न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सीजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की मौत और कई महिलाओं की किडनी खराब होने की घटना अब केवल चिकित्सा लापरवाही का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह राजस्थान की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल बनकर खड़ी हो गई है। इस दर्दनाक घटनाक्रम ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। अस्पतालों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, दवा गुणवत्ता, ऑपरेशन थिएटर प्रबंधन और जवाबदेही को लेकर जनता में भारी आक्रोश है।
इसी बीच राजस्थान कांग्रेस ने इस मामले को “मानवता के खिलाफ गंभीर लापरवाही” बताते हुए अपनी विशेष जांच समिति गठित कर दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने वरिष्ठ नेताओं और चिकित्सा विशेषज्ञों को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है।
कांग्रेस की ‘स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम’ मैदान में
कांग्रेस द्वारा गठित चार सदस्यीय कमेटी को तत्काल कोटा रवाना होने और तीन दिन में विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। समिति में शामिल हैं—
- परसादी लाल मीणा — पूर्व स्वास्थ्य मंत्री, जिन्हें सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य तंत्र का व्यापक अनुभव है।
- डूंगरराम गैदर — वरिष्ठ विधायक, जो प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दों को मजबूती से उठाते रहे हैं।
- पुष्पेंद्र भारद्वाज — स्थानीय स्तर पर पीड़ित परिवारों, डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन से तथ्य जुटाने की जिम्मेदारी।
- विकास महला — चिकित्सा विशेषज्ञ के रूप में संक्रमण, दवा और सर्जिकल प्रक्रियाओं की तकनीकी जांच करेंगे।
कांग्रेस का कहना है कि यह समिति केवल औपचारिक जांच नहीं करेगी, बल्कि “जमीनी सच्चाई” सामने लाएगी।
क्या अस्पताल संक्रमण का अड्डा बन गए हैं?
घटना ने राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था पर बेहद गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सवाल उठ रहे हैं कि—
- क्या ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण नियंत्रण के नियमों की अनदेखी हुई?
- क्या सर्जरी उपकरणों की स्टरलाइजेशन प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई?
- क्या मरीजों को दी गई दवाओं या इंजेक्शन की गुणवत्ता संदिग्ध थी?
- क्या प्रसूताओं की निगरानी समय पर नहीं हुई?
- क्या ICU और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर में भारी कमी थी?
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि सीजेरियन ऑपरेशन के बाद यदि संक्रमण तेजी से फैले और मरीजों की किडनी प्रभावित होने लगे, तो यह सामान्य स्थिति नहीं मानी जाती। यह या तो गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण, सेप्सिस, दवा रिएक्शन या अस्पताल प्रबंधन की बड़ी विफलता की ओर संकेत करता है।
“जीरो टॉलरेंस” के दावों पर सवाल
पूर्व स्वास्थ्य मंत्री परसादी लाल मीणा ने राज्य सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि यदि स्वास्थ्य सेवाओं में “जीरो टॉलरेंस” नीति लागू है, तो फिर सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जान क्यों जा रही है?
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सरकार हर बड़े हादसे के बाद केवल जांच कमेटियां बनाकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती है, जबकि जमीनी स्तर पर अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, उपकरणों की खराब स्थिति, संक्रमण नियंत्रण की कमजोरी और प्रशासनिक अव्यवस्था लगातार बढ़ती जा रही है।
सरकारी अस्पतालों की जमीनी हकीकत फिर उजागर
कोटा अस्पताल की स्थिति उस समय और चर्चा में आ गई जब भाजपा विधायक संदीप शर्मा अस्पताल में पीड़ितों से मिलने पहुंचे और स्वयं लिफ्ट में फंस गए। इस घटना ने अस्पताल की तकनीकी और व्यवस्थागत बदहाली को उजागर कर दिया।
जनता के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब जनप्रतिनिधि तक सुरक्षित नहीं हैं, तो आम मरीजों की स्थिति कैसी होगी?
राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न
राजस्थान के कई सरकारी अस्पताल पहले भी संक्रमण, अव्यवस्था, डॉक्टरों की कमी और उपकरणों की खराबी को लेकर विवादों में रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि—
- कई अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण समितियां केवल कागजों तक सीमित हैं।
- ऑपरेशन थिएटर ऑडिट नियमित नहीं होते।
- बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन में गंभीर खामियां हैं।
- नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल कर्मचारियों पर अत्यधिक कार्यभार है।
- ICU बेड और नेफ्रोलॉजी सुविधाएं सीमित हैं।
ऐसे में प्रसूताओं जैसी संवेदनशील मरीजों पर जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
पीड़ित परिवारों में आक्रोश, जवाब मांग रही जनता
मृत महिलाओं के परिवारों का कहना है कि वे स्वस्थ अवस्था में अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन ऑपरेशन के बाद अचानक हालत बिगड़ती चली गई। कई परिवारों ने समय पर जानकारी नहीं मिलने और चिकित्सकीय पारदर्शिता की कमी का भी आरोप लगाया है।
नवजात बच्चों के भविष्य को लेकर भी चिंता गहराती जा रही है। कई मासूम जन्म लेते ही मां का साया खो चुके हैं।
कांग्रेस का ऐलान— “सच्चाई सामने लाकर रहेंगे”
प्रदेश कांग्रेस ने कहा है कि यदि जांच में चिकित्सा लापरवाही, संक्रमण प्रबंधन में विफलता या प्रशासनिक अनियमितता सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की जाएगी। पार्टी ने पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए सड़क से सदन तक संघर्ष का संकेत दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल
क्या यह केवल एक अस्पताल की लापरवाही है?
या फिर राजस्थान की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में गहराई तक फैल चुकी अव्यवस्था का भयावह चेहरा?
कोटा की यह घटना अब पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी बन चुकी है। जनता जानना चाहती है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचे लोग सुरक्षित हैं भी या नहीं।
