राजस्थान हाईकोर्ट की पुलिस को सख्त चेतावनी : “न जुलूस, न मीडिया ट्रायल, न सार्वजनिक बेइज्जती — गिरफ्तारी सजा नहीं”

Written by : Sanjay kumar

आरोपी की फोटो-वीडियो वायरल करना, सार्वजनिक परेड निकालना और मीडिया में अपराधी की तरह पेश करना कानून के खिलाफ; हाईकोर्ट ने जारी किए कड़े दिशा-निर्देश

जोधपुर, 7 मई 2026। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों की फोटो-वीडियो सोशल मीडिया, समाचार माध्यमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित कर सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने स्पष्ट कहा कि “गिरफ्तारी किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का अंत नहीं है” और पुलिस को किसी भी आरोपी को “सार्वजनिक सजा” देने का अधिकार नहीं है।

“आरोपी केवल आरोपी है, दोषी नहीं”

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध किए जाने से पहले अपराधी की तरह प्रस्तुत करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमा, सम्मान और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने दो टूक कहा कि जांच एजेंसी के पास जांच करने की शक्ति है, लेकिन किसी को दोषी घोषित करने की नहीं।

पीठ ने कहा कि “आरोपी केवल आरोपी होता है, दोषी नहीं।” जब तक न्यायिक प्रक्रिया के बाद अपराध सिद्ध न हो जाए, तब तक व्यक्ति निर्दोष माना जाएगा। ऐसे में पुलिस द्वारा फोटो वायरल कर सामाजिक रूप से दोषी साबित करने का प्रयास न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जाएगा।

“गरिमा का अधिकार गिरफ्तारी के बाद खत्म नहीं होता”

कोर्ट ने कहा कि जीवन के अधिकार में सम्मान और आत्मसम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है और यह अधिकार गिरफ्तारी के बाद भी समाप्त नहीं होता। अदालत ने पुलिस द्वारा आरोपियों को अर्धनग्न अवस्था में बैठाकर फोटो लेने, सार्वजनिक परेड कराने तथा सोशल मीडिया पर प्रसारित करने की कार्रवाई को “Institutional Humiliation” यानी संस्थागत अपमान बताया।

अपराधियों के सार्वजनिक जुलूस पर भी सख्त संदेश

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद यह स्पष्ट माना जा रहा है कि पुलिस किसी आरोपी या गिरफ्तार व्यक्ति का “सार्वजनिक जुलूस” या “परेड” अपमानित करने के उद्देश्य से नहीं निकाल सकती। अदालत ने साफ कहा कि पुलिस को दंड देने का अधिकार नहीं है और किसी आरोपी को भीड़ के सामने घुमाना, तख्ती पकड़ाना, सड़क पर प्रदर्शन करना या जनता के बीच अपराधी की तरह पेश करना कानून की भावना के खिलाफ है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में “अपराधियों की परेड” जैसी पुलिस कार्रवाई पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। यदि किसी आरोपी को केवल भय, प्रचार या सार्वजनिक अपमान के उद्देश्य से घुमाया जाता है, तो ऐसी कार्रवाई अदालत की नजर में असंवैधानिक मानी जा सकती है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस और मीडिया ट्रायल पर भी बड़ा संकेत

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा आरोपियों की फोटो-वीडियो अखबारों, डिजिटल पोर्टल्स और सोशल मीडिया पर प्रसारित करना व्यक्ति की गरिमा और निजता पर हमला है। अदालत की टिप्पणी के बाद यह भी माना जा रहा है कि पुलिस आरोपी को मीडिया के सामने पेश कर उसे अपराधी की तरह प्रचारित नहीं कर सकती।

हालांकि पुलिस मामले की तथ्यात्मक जानकारी मीडिया को दे सकती है, लेकिन आरोपी को कैमरे के सामने खड़ा कर “यही अपराधी है” जैसे तरीके से प्रस्तुत करना, प्रेस वार्ता में चेहरा दिखाना, फोटो शूट करवाना या सोशल मीडिया पर प्रचारित करना अब गंभीर कानूनी विवाद का विषय बन सकता है।

विशेष रूप से निम्न प्रकार की कार्रवाइयों पर अदालत की भावना सख्त मानी जा रही है—

  • आरोपी का चेहरा सार्वजनिक रूप से दिखाना
  • प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोपी को बैठाना या खड़ा करना
  • मीडिया के लिए फोटो और वीडियो शूट करवाना
  • सोशल मीडिया पर “अपराधी पकड़ा गया” जैसे प्रचारात्मक पोस्ट करना
  • अखबारों और चैनलों में आरोपी की अपमानजनक प्रस्तुति करना

संबंधित पुलिसकर्मियों पर होगी कार्रवाई

अदालत ने निर्देश दिया कि निर्धारित मानक कार्यप्रणाली (SOP) का सख्ती से पालन किया जाए और किसी भी प्रकार का उल्लंघन होने पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

सभी थानों और वेबसाइटों पर प्रदर्शित होंगे निर्देश

हाईकोर्ट ने निर्देश दिए कि यह दिशा-निर्देश सभी पुलिस थानों तथा पुलिस विभाग और गृह विभाग की आधिकारिक वेबसाइटों पर प्रमुखता से प्रदर्शित किए जाएं, ताकि आमजन अपने अधिकारों से अवगत हो सकें और संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

जैसलमेर प्रकरण से उठा मामला

मामला जैसलमेर जिले के एक प्रकरण से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया कि गिरफ्तारी के बाद आरोपियों को अपमानजनक स्थिति में बैठाकर उनकी फोटो और वीडियो बनाए गए तथा बाद में उन्हें प्रसारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रजाक खान ने पैरवी की, जबकि न्याय मित्र देवकीनंदन व्यास ने अदालत को आवश्यक तथ्यों से अवगत कराया।

हाईकोर्ट की तीन बड़ी बातें

1. जांच एजेंसी किसी को दोषी घोषित नहीं कर सकती। आरोपी तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक अदालत अपराध सिद्ध न कर दे।

2. जनता का विश्वास कानून के शासन और निष्पक्ष प्रक्रिया से बनता है, न कि सार्वजनिक प्रदर्शन और अपमान से।

3. गिरफ्तारी के बाद भी व्यक्ति का सम्मान, गरिमा और निजता का अधिकार समाप्त नहीं होता।

मानवाधिकार और पुलिस सुधार पर ऐतिहासिक टिप्पणी

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में पुलिस कार्यप्रणाली, मानवाधिकार संरक्षण, मीडिया ट्रायल और डिजिटल युग में निजता के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि कानून लागू करने के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा को कुचला नहीं जा सकता।

Pramukh Samvad

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