Writtan by : Sanjay kumar
जयपुर, 4 जुलाई।
राजस्थान सरकार ने कम नामांकन वाले 300 महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में हिंदी माध्यम भी संचालित करने की तैयारी शुरू कर दी है। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने इन स्कूलों की ब्लॉकवार सूची जारी करते हुए प्रत्येक स्कूल का नामांकन और शिक्षकों की संख्या सार्वजनिक की है। साथ ही संबंधित जिला शिक्षा अधिकारियों से सात दिन के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी गई है। शिक्षा विभाग का कहना है कि यह कदम कम नामांकन वाले स्कूलों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए उठाया गया है, लेकिन इस निर्णय ने प्रदेश की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है।
“कभी बोले थे ‘भांग खाकर खोले गए स्कूल’, अब 300 स्कूलों में हिंदी माध्यम की तैयारी; शिक्षा मंत्री के पुराने बयान से फिर गरमाई सियासत”
सरकार बदलने के बाद शिक्षा मंत्री मदन दिलावर महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को लेकर लगातार मुखर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न मंचों और विधानसभा में इन स्कूलों पर सवाल उठाते हुए इन्हें “थर्ड क्लास” तक बताया था और यहां तक कहा था कि “भांग खाकर स्कूल खोल दिए गए।” अब कम नामांकन वाले 300 स्कूलों में हिंदी माध्यम शुरू करने की कवायद के बीच उनके उसी बयान की फिर चर्चा तेज हो गई है। विपक्ष इसे राजनीतिक कार्रवाई बता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि पूरी प्रक्रिया केवल कम नामांकन और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर की जा रही है।
300 स्कूलों की सूची जारी, सात दिन में मांगी तथ्यात्मक रिपोर्ट
शिक्षा विभाग ने जिन 300 महात्मा गांधी स्कूलों का चयन किया है, उनमें कम छात्र संख्या को आधार बनाया गया है। जिला शिक्षा विभागों से इन स्कूलों की वर्तमान स्थिति, नामांकन और संचालन संबंधी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
सबसे ज्यादा सीकर और लक्ष्मणगढ़ के स्कूल सूची में
जारी सूची के अनुसार सबसे अधिक 45 महात्मा गांधी स्कूल सीकर जिले के हैं। इनमें 20 स्कूल पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मणगढ़ के हैं। यही कारण है कि इस निर्णय को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
महात्मा गांधी स्कूलों की शुरुआत कैसे हुई थी?
राजस्थान में महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की शुरुआत वर्ष 2019-20 में जिला मुख्यालयों से हुई थी। बाद में तत्कालीन शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा के कार्यकाल में वर्ष 2021 से इनका विस्तार पांच हजार या उससे अधिक आबादी वाले गांवों और कस्बों तक किया गया, जिससे बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल अंग्रेजी माध्यम में परिवर्तित किए गए।
फैसले पर सियासत भी गर्म
कम नामांकन वाले स्कूलों में हिंदी माध्यम शुरू करने की पहल को विपक्ष राजनीतिक नजरिए से देख रहा है। खासकर लक्ष्मणगढ़ विधानसभा क्षेत्र के 20 स्कूलों के सूची में शामिल होने के बाद इस फैसले पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। हालांकि शिक्षा विभाग का कहना है कि सभी स्कूलों का चयन केवल नामांकन के आंकड़ों के आधार पर निष्पक्ष तरीके से किया गया है।
क्या भविष्य में अंग्रेजी माध्यम खत्म हो सकता है?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन स्कूलों में हिंदी माध्यम में नामांकन तेजी से बढ़ता है और अंग्रेजी माध्यम में छात्रों की संख्या लगातार कम रहती है, तो भविष्य में सरकार इन स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम को सीमित करने या समाप्त कर उन्हें सामान्य हिंदी माध्यम विद्यालय के रूप में संचालित करने पर भी विचार कर सकती है। हालांकि फिलहाल सरकार की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक निर्णय घोषित नहीं किया गया है।
शिक्षा विभाग का पक्ष
शिक्षा विभाग का कहना है कि स्कूलों का चयन पूरी तरह कम नामांकन के आधार पर किया गया है। इसका उद्देश्य विद्यालयों की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है। विभाग का दावा है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और तथ्यात्मक रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ाई जाएगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हिंदी माध्यम शुरू होने के बाद इन महात्मा गांधी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम पहले की तरह जारी रहेगा, या आने वाले समय में इनका स्वरूप बदल जाएगा। शिक्षा विभाग की आगामी रिपोर्ट और सरकार के अगले निर्णय पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं।
