Written by : Sanjay kumar
नई दिल्ली | 29 जनवरी 2026
सुप्रीम कोर्ट द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ पर रोक लगाए जाने के फैसले ने केंद्र सरकार और खासतौर पर उत्तर प्रदेश की राजनीति को बड़ी राहत दी है। यह मुद्दा भले ही तकनीकी रूप से उच्च शिक्षा से जुड़ा हो, लेकिन इसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ इतने गहरे थे कि इसका असर 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव तक महसूस किया जा रहा था।
कोर्ट के इस हस्तक्षेप से सरकार को न केवल एक संवैधानिक संतुलन साधने का अवसर मिला है, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों में बढ़ते तनाव को भी फिलहाल विराम मिला है।
क्या थे UGC के नए नियम और क्यों हुआ विरोध
UGC ने 13 जनवरी 2026 को नए इक्विटी नियम अधिसूचित किए थे, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकना और समानता को बढ़ावा देना बताया गया। इन नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में:
- इक्विटी कमिटी,
- इक्विटी स्क्वाड,
- और शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Mechanism) अनिवार्य किया गया था।
लेकिन विवाद की सबसे बड़ी वजह बना रेगुलेशन 3(c), जिसमें जातिगत भेदभाव की परिभाषा को केवल SC, ST और OBC वर्गों तक सीमित कर दिया गया। इससे सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को जाति आधारित भेदभाव की शिकायत में कानूनी संरक्षण नहीं मिलता।
विरोध करने वालों का कहना था कि:
- यह व्यवस्था अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है,
- नियमों की भाषा अस्पष्ट है,
- और इनके दुरुपयोग की पूरी संभावना है, जबकि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया।
देशभर में विरोध, यूपी में सबसे ज्यादा सियासी दबाव
इन नियमों के खिलाफ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों में छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन किए। उत्तर प्रदेश में इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई दिया, जहां जगह-जगह विरोध, ज्ञापन और इस्तीफे सामने आए।
बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा इस असंतोष का सबसे बड़ा प्रतीक बना। इसके बाद ब्राह्मण विधायकों और संगठनों की बैठकों ने बीजेपी की चिंता और बढ़ा दी।
यूपी बीजेपी की दुविधा: कानून हटाओ तो एक वर्ग नाराज़, न हटाओ तो दूसरा
यूपी में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती यह थी कि:
- यदि सरकार UGC के नियम वापस लेती, तो दलित और ओबीसी वोट बैंक के खिसकने का खतरा था,
- और यदि नियमों पर अड़ी रहती, तो सवर्ण समाज, खासकर ब्राह्मण वर्ग की नाराजगी झेलनी पड़ती।
यूपी में ब्राह्मण वोट भले ही लगभग 12 प्रतिशत हों, लेकिन राजनीतिक माहौल बनाने में उनकी भूमिका अहम मानी जाती है। वहीं 2017 से 2022 तक बीजेपी की जीत में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों की निर्णायक भूमिका रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी के वोट शेयर में करीब 8.5 प्रतिशत की गिरावट और 26 सीटों का नुकसान पहले ही पार्टी के लिए चेतावनी बन चुका था। ऐसे में UGC नियमों को लेकर उपजा सामाजिक विभाजन 2027 के चुनाव से पहले पार्टी को और मुश्किल में डाल सकता था।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: संतुलन की कोशिश
29 जनवरी 2026 को CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने UGC के 2026 के इक्विटी नियमों को तत्काल प्रभाव से ‘केप्ट इन अबेयेंस’ (स्थगित) कर दिया।
कोर्ट ने नियमों को:
- ‘वाग’ (अस्पष्ट),
- और ‘मिसयूज’ (दुरुपयोग) की संभावना वाला बताया।
साथ ही कहा कि प्रथम दृष्टया ये नियम सामान्य वर्ग के प्रति भेदभावपूर्ण प्रतीत होते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी। तब तक 2012 के पुराने एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियम ही लागू रहेंगे।
राजनीतिक और सामाजिक राहत
सुप्रीम कोर्ट की इस रोक से:
- सरकार को नियमों पर पुनर्विचार और पुनर्लेखन (रीड्राफ्टिंग) का मौका मिला है,
- यूपी बीजेपी को चुनावी मोर्चे पर बड़ी राहत मिली है,
- और समाज में अगड़े-पिछड़े के बीच बढ़ता तनाव फिलहाल थमता नजर आ रहा है।
अब उम्मीद की जा रही है कि नए सिरे से ऐसे नियम तैयार किए जाएंगे, जो:
- जातिगत भेदभाव को प्रभावी ढंग से रोकें,
- सभी वर्गों के लिए समान संरक्षण सुनिश्चित करें,
- और दुरुपयोग की संभावनाओं पर भी सख्त रोक लगाएं।
आगे की राह
यह मामला सिर्फ UGC या उच्च शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक समानता, सामाजिक न्याय और नीति निर्माण की संवेदनशीलता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। 19 मार्च की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का रुख यह तय करेगा कि उच्च शिक्षा में इक्विटी और समानता की दिशा किस तरह आगे बढ़ेगी और इसका असर आने वाले वर्षों तक देश की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।
