Written by : प्रमुख संवाद
कोटा, 20 अप्रैल।
शुद्धाद्वैत प्रथम पीठ श्री बड़े मथुराधीश मंदिर पाटनपोल में अक्षय तृतीया पर सोमवार को ‘चंदन महोत्सव’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रभु मथुराधीश के मनमोहक स्वरूप को निहारने के लिए अलसुबह से ही भक्तों का तांता लग गया। मंदिर परिसर प्रभु के जयकारों से गुंजायमान रहा और समूचा वातावरण भक्तिमय हो गया।
प्रातःकाल शंखनाद के साथ महोत्सव का शुभारंभ हुआ। परंपरा के अनुसार, मंदिर के प्रमुख द्वारों की देहरी का विधिवत पूजन कर उन्हें हल्दी से लीपा गया और आशापाला की सूत की डोरी की वंदनवार सजाई गई। निज मंदिर में श्वेत केसर की किनारी के चंदवा बांधे गए। प्रभु मथुराधीश को चंदन के ठाड़े वस्त्र, मोती, हीरा एवं स्वर्ण के कंठहार, बाजूबंद, पौची, हस्त सांखला और रेशम की मुद्रिकाओं से अलंकृत किया गया। प्रभु का यह शीतल और दिव्य स्वरूप भक्तों के आकर्षण का केंद्र बना रहा।
अक्षय परंपरा का मार्ग है पुष्टिमार्ग
प्रथम पीठ के युवराज मिलन बावा ने पर्व की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अक्षय तृतीया वह तिथि है जिसका कभी क्षय नहीं होता। इसी दिन से त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। उन्होंने कहा कि पुष्टिमार्ग वास्तव में अक्षय परंपरा का मार्ग है, जहाँ ऋतु परिवर्तन के अनुरूप प्रभु के सुख की आराधना की जाती है। ग्रीष्म ऋतु (उष्णकाल) की बढ़ती तपन को देखते हुए प्रभु को शीतलता प्रदान करने के लिए अक्षय तृतीया से ‘चंदन यात्रा’ का शुभारंभ हुआ है। प्रभु को अर्पित किए जाने वाले इस विशेष चंदन में मलयगिरि पर्वत की चंदन लकड़ी के साथ केसर की विशेष मात्रा मिश्रित की गई है। भक्तों द्वारा प्रभु को चंदन अर्पण करने का भाव उनके विरह निवेदन और हृदय की शीतलता से जुड़ा है।
फूल मंडली में हुए दर्शन
शाम के समय मंदिर में विशेष ‘फूल मंडली’ के दर्शन हुए। जहाँ फूलों की सघन सुवास के बीच प्रभु विराजे। इस दौरान मंदिर के चौक में “अक्षय तृतीया अक्षय…”, “देख सखी गोविंद के चंदन…” और “मेरे गृह चंदन अति कोमल…” जैसे मधुर पुष्टिमार्गीय कीर्तनों ने भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, प्रभु की सेवा का क्रम भी सूक्ष्मता और कोमलता की ओर बढ़ता जाता है, जो पुष्टिमार्ग की अद्भुत सेवा पद्धति का परिचायक है।
देर रात शयन के दर्शनों तक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर में डटी रही।
