Written by : Sanjay kumar
नई दिल्ली, 16 मई 2026। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP-2020) के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। नए नियम के तहत विद्यार्थियों को आर1, आर2 और आर3 श्रेणी में तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय मूल की भाषाएं होना आवश्यक होगा। कक्षा 10 में तीसरी भाषा (R3) की बोर्ड परीक्षा नहीं होगी और उसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर किया जाएगा।
सीबीएसई के अनुसार यह व्यवस्था चरणबद्ध तरीके से लागू होगी। आर1 छात्र की मुख्य भाषा होगी, आर2 दूसरी भाषा होगी और आर3 को भाषा विविधता के उद्देश्य से शामिल किया गया है। साथ ही गणित और विज्ञान विषयों में भी दो-स्तरीय प्रणाली लागू की जाएगी, जिसमें सामान्य और उन्नत स्तर शामिल होंगे।
यह बदलाव क्यों जरूरी पड़ा?
विशेषज्ञों और शिक्षा नीति दस्तावेजों के अनुसार नई व्यवस्था केवल भाषा बढ़ाने के लिए नहीं लाई गई है, बल्कि इसके पीछे कई शैक्षणिक और व्यावहारिक कारण हैं।
1. बहुभाषी क्षमता विकसित करना
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कहा गया है कि भारत जैसे विविध भाषाई देश में विद्यार्थियों की बहुभाषी क्षमता विकसित करना आवश्यक है ताकि उनकी सीखने की क्षमता और संज्ञानात्मक विकास बेहतर हो सके।
2. भारतीय भाषाओं और संस्कृति को बढ़ावा
नई नीति का उद्देश्य भारतीय भाषाओं को मजबूत करना और विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़े रखना है।
3. नई शोधों में बहुभाषी शिक्षा के लाभ
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार एक से अधिक भाषाओं का अध्ययन करने से बच्चों की तार्किक क्षमता, स्मरण शक्ति, संचार कौशल और समस्या समाधान क्षमता बेहतर होती है। इसी आधार पर एनसीएफ-एसई 2023 ने तीन भाषा मॉडल को आगे बढ़ाने की अनुशंसा की थी।
4. बोर्ड परीक्षा का दबाव कम करने की कोशिश
सीबीएसई ने स्पष्ट किया है कि तीसरी भाषा की बोर्ड परीक्षा नहीं होगी ताकि सीखने पर ध्यान रहे और छात्रों पर अतिरिक्त परीक्षा दबाव न बढ़े।
हालांकि इस निर्णय को लेकर छात्रों और अभिभावकों के बीच मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने वाला कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि इससे विद्यार्थियों पर अतिरिक्त अध्ययन बोझ बढ़ सकता है। सोशल मीडिया और छात्र समुदायों में इस पर चर्चा भी शुरू हो चुकी है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नई व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्कूलों में पर्याप्त भाषा शिक्षक, पाठ्य सामग्री और संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं या नहीं।
