Written by : प्रमुख संवाद
कोटा, 17 जुलाई।
शिक्षा नगरी कोटा इस वर्ष एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक क्षण का साक्षी बनने जा रही है। लगभग 46 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य, उनके लघु भ्राता तथा तप, त्याग और उत्कृष्ट साधना के प्रतीक निर्यापक मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज का पावन चातुर्मास (वर्षायोग) श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी, दादाबाड़ी में संपन्न होगा। इस आयोजन को लेकर कोटा ही नहीं, बल्कि संपूर्ण हाड़ौती और देशभर के जैन समाज में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का वातावरण है। यह चातुर्मास कोटा के धार्मिक एवं आध्यात्मिक इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय माना जा रहा है।

19 जुलाई को निकलेगा भव्य मंगल प्रवेश जुलूस
नसियां जी मंदिर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि मुनिश्री के मंगल आगमन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 19 जुलाई (रविवार) प्रातः 8 बजे सीएडी सर्किल से भव्य मंगल प्रवेश जुलूस प्रारंभ होगा। यह जुलूस एस.एस. डेयरी, छोटा चौराहा दादाबाड़ी और महावीर कॉम्प्लेक्स होते हुए नसियां जी मंदिर पहुंचेगा। पूरे मार्ग पर 51 भव्य स्वागत द्वार बनाए जाएंगे, जहां श्रद्धालु पुष्पवर्षा, मंगलगान और जयघोष के साथ मुनिश्री का अभिनंदन करेंगे।
पांच बैंड, मशक बाजा और हजारों श्रद्धालुओं की रहेगी सहभागिता
मंदिर समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि जुलूस में पांच आकर्षक बैंड शामिल होंगे, जिनमें एक विशेष बैंड भटिंडा से आएगा। इसके अलावा पारंपरिक मशक बाजा, जैन पाठशालाओं के बच्चों का बैंड, विभिन्न जैन मंदिरों के श्रद्धालु, महिला मंडल और सकल जैन समाज के हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेंगे। मंदिर पहुंचने पर पादप्रक्षालन, शास्त्र भेंट और मुनिश्री के मंगल प्रवचन आयोजित किए जाएंगे।
श्रद्धा और अनुशासन का रहेगा विशेष समन्वय
कोषाध्यक्ष मनीष मोहिवाल ने बताया कि मंगल प्रवेश जुलूस के लिए महिलाओं के लिए केसरिया साड़ी तथा पुरुषों के लिए सफेद कुर्ता-पायजामा निर्धारित किया गया है। विभिन्न महिला मंडल अपनी पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होकर आयोजन की गरिमा और भव्यता को बढ़ाएंगे।
छह वर्षों बाद फिर सजेगा नसियां जी में चातुर्मास
हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि वर्ष 2019 में मुनि श्री विनीतसागर जी महाराज का चातुर्मास नसियां जी में आयोजित हुआ था। लगभग छह वर्षों बाद पुनः यह पावन अवसर प्राप्त हो रहा है, जिससे जैन समाज में विशेष उत्साह है। इसे कोटा के धार्मिक इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
46 वर्षों बाद राजस्थान में हुआ ऐतिहासिक प्रवेश
निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने लगभग 46 वर्षों बाद चंद्रोदय तीर्थ, चांदखेड़ी अतिशय क्षेत्र से राजस्थान की पावन धरा पर प्रवेश किया। क्षेत्र के अध्यक्ष हुकमचंद जैन ‘काका’ सहित समाजजनों ने उनकी अगवानी कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उनका विहार रामगंजमंडी, कोटा, बिजोलिया, अजमेर, आंवा, नैनवां, देई, खटकड़, केशोरायपाटन और तालेड़ा सहित अनेक क्षेत्रों से होता हुआ आगे बढ़ा। इस दौरान उन्होंने अनेक प्राचीन जिनालयों में दर्शन-वंदन कर श्रद्धालुओं को धर्मलाभ प्रदान किया।
संपूर्ण परिवार ने अपनाया मोक्ष मार्ग
मंदिर समिति के उपाध्यक्ष धर्मचंद जैन एवं सुमित सेंकी ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज का पूर्व नाम ब्रह्मचारी अनंत जैन (अष्टगे) था। उनका जन्म 26 सितंबर 1956 को कर्नाटक के सदलगा (बेलगांव) में हुआ। उनके पिता श्रीमलप्पा जैन ने आगे चलकर मुनि श्री मल्लीसागर जी महाराज के रूप में तथा माता श्रीमन्ति जी ने आर्यिका समयमति माताजी के रूप में दीक्षा ग्रहण की। उनका संपूर्ण परिवार मोक्ष मार्ग को समर्पित रहा।
इसी परिवार से आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज, पट्टाचार्य श्री समयसागर जी महाराज तथा मुनि श्री उत्कृष्टसागर जी महाराज जैसे महान संतों ने जैन धर्म की गौरवशाली परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
दीक्षा से निर्यापक पद तक प्रेरणादायी आध्यात्मिक यात्रा
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने 2 मई 1975 को श्री महावीरजी (राजस्थान) में ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया। 18 दिसंबर 1975 को सोनागिरि (मध्यप्रदेश) में क्षुल्लक दीक्षा, 19 नवंबर 1977 को कुण्डलपुर (मध्यप्रदेश) में ऐलक दीक्षा तथा 15 अप्रैल 1980 को मोराजी सागर (मध्यप्रदेश) में आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज से मुनि दीक्षा प्राप्त की। 8 मार्च 2019 को बीना बारहा (मध्यप्रदेश) में उन्हें निर्यापक पद से अलंकृत किया गया।
तप, साहित्य और साधना का अद्भुत संगम
निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी महाराज श्रेष्ठ वक्ता, तपस्वी, साहित्यकार, कवि, चिंतक और अध्यात्मप्रेमी संत के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने अनेक प्रेरणादायी धार्मिक कृतियों की रचना की है, जिनमें ‘आत्म शिल्पी आचार्य श्री विद्यासागर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अलावा उन्होंने बारह भावना, चौबीस तीर्थंकर स्तुति सहित अनेक आध्यात्मिक रचनाएं लिखी हैं। वे करोड़ों जाप, कठोर तप और उपवास साधना के लिए भी प्रसिद्ध हैं। वर्ष 1993 में गोमटेश्वर बाहुबली महामस्तकाभिषेक में उनकी महत्वपूर्ण सहभागिता रही। उनके सान्निध्य में अनेक पंचकल्याणक, महाविधान, वेदी प्रतिष्ठा और धर्म प्रभावना के ऐतिहासिक कार्य संपन्न हुए हैं।
गुरुभक्ति से भावुक बना यह वर्षायोग
श्रद्धालुओं के अनुसार मुनिश्री की हार्दिक इच्छा थी कि राजस्थान प्रवेश के समय उन्हें अपने दीक्षा गुरु आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का सान्निध्य प्राप्त हो। किंतु आचार्यश्री के ब्रह्मलीन हो जाने के कारण यह भाव पूर्ण नहीं हो सका। यही कारण है कि कोटा में आयोजित यह वर्षायोग गुरु-भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक भावनाओं से ओतप्रोत एक अत्यंत भावपूर्ण एवं ऐतिहासिक आयोजन बन गया है।
हाड़ौती के धार्मिक इतिहास में जुड़ेगा स्वर्णिम अध्याय
कोटा में आयोजित होने वाला यह चातुर्मास केवल जैन समाज का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संपूर्ण हाड़ौती क्षेत्र के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का एक ऐतिहासिक पर्व होगा। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि निर्यापक मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के सान्निध्य से कोटा की यह पावन भूमि धर्म, साधना, संयम और आत्मकल्याण की प्रेरणा का प्रमुख केंद्र बनेगी।
