Written by : Sanjay kumar
जयपुर, 25 अगस्त। राजस्थान में आगामी नगर निकाय चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों में टिकटों के बंटवारे और समीकरण साधने की प्रक्रिया तेज हो गई है। राजनीतिक दलों की नजरें सिर्फ पार्षदों की जीत पर ही नहीं, बल्कि चुनाव के बाद तय होने वाले महापौर, सभापति और अध्यक्ष जैसे शीर्ष पदों पर भी टिकी हुई हैं। इस बार चुनावों से जुड़ा एक खास नियम खासी चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति बिना पार्षद चुने गए भी सीधे इन बड़े पदों की कुर्सी तक पहुंच सकता है।
बिना पार्षद का चुनाव लड़े सीधे शीर्ष पद पर बैठने की कानूनी छूट
राजस्थान के चुनावी नियमों के अनुसार, नगर निगमों में महापौर और नगर निकायों में अध्यक्ष या सभापति बनने के लिए उम्मीदवार का निर्वाचित पार्षद होना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। राजनीतिक दल किसी ऐसे प्रभावशाली चेहरे को भी सीधे मेयर या अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतार सकते हैं, जिसने पार्षद का चुनाव लड़ा ही न हो। इस प्रावधान के कारण उन बड़े और दिग्गज नेताओं की उम्मीदें फिर से जाग गई हैं, जो हालिया चुनावों में हार गए थे लेकिन अपने क्षेत्र में मजबूत राजनीतिक पकड़ रखते हैं।
वर्ष 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा किया गया था संशोधन
इस नियम का इतिहास वर्ष 2019 से जुड़ा है, जब तत्कालीन अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने राजस्थान नगरपालिका (निर्वाचन) नियमों में बड़ा संशोधन किया था। इस संशोधन के जरिए निकाय अध्यक्ष या महापौर पद के प्रत्याशी के लिए निर्वाचित पार्षद होने की अनिवार्यता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था। तय प्रावधानों के अनुसार, जो व्यक्ति पार्षद का चुनाव लड़ने की योग्यताएं पूरी करता है, वह सीधे इस पद के लिए पात्र माना जाता है, हालांकि उसका चयन सदन के निर्वाचित पार्षदों द्वारा मतदान के माध्यम से किया जाता है।
बिना पार्षद के महापौर, सभापति या अध्यक्ष बनने का क्या है नियम और प्रावधान?
राज्य निर्वाचन आयोग के नियमों और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों के तहत, कोई भी बाहरी व्यक्ति जो नगर पालिका सदस्य बनने की वैधानिक योग्यता रखता है (जैसे कम से कम 21 वर्ष की आयु और अन्य विधिक पात्रताएं), वह सीधे अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर सकता है। हालांकि, इसके लिए नियम यह है कि उस उम्मीदवार के नामांकन पत्र पर किसी निर्वाचित पार्षद द्वारा प्रस्तावक के रूप में हस्ताक्षर किया जाना अनिवार्य होता है। इसके अलावा, चुनाव मैदान में उतरने वाले गैर-पार्षद उम्मीदवार को चुनाव लड़ने वाले वार्ड के सदस्य या पार्षद के रूप में सीधे मैदान में उतरे बिना, निर्वाचित पार्षदों के सदन द्वारा बहुमत के आधार पर मतदान के माध्यम से चुना जाता है।
सत्ता परिवर्तन के बाद भी भजनलाल सरकार ने यथावत रखा प्रावधान
जब वर्ष 2019 में कांग्रेस सरकार ने इस नियम को लागू किया था, तब विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसका पुरजोर विरोध किया था। हालांकि, बाद में वर्ष 2023 में राज्य में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बावजूद इस नियम में कोई बदलाव नहीं किया गया और इसे जस का तस बनाए रखा गया। वर्तमान में यह प्रावधान दोनों ही प्रमुख दलों के लिए एक रणनीतिक विकल्प के रूप में खुला हुआ है।
दिग्गज और हारे हुए नेताओं के लिए राजनीतिक पुनर्वापसी का बड़ा अवसर
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियम जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे प्रमुख शहरों में दलों को बड़ी सहूलियत देता है। स्थानीय गुटबाजी या अन्य कारणों से यदि कोई वरिष्ठ नेता पार्षद का चुनाव लड़ने से बचता है या हार जाता है, तो पार्टी परिणाम आने के बाद उसे सीधे महापौर या अध्यक्ष पद की कमान सौंप सकती है। इससे विधानसभा या लोकसभा चुनावों में हार का सामना करने वाले नेताओं के लिए स्थानीय राजनीति के रास्ते अपनी राजनीतिक पारी दोबारा शुरू करने के द्वार खुल जाते हैं।
