Written by : Sanjay kumar
कोटा/जयपुर: 27 अगस्त।
राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों में चुनावी बिगुल बज चुका है, लेकिन नामांकन के पहले ही दिन से राजनीति का जो रंग देखने को मिल रहा है, उसने हर किसी को चौंका दिया है। रक्षाबंधन और रविवार के पेंच के कारण प्रत्याशियों के पास नामांकन के लिए व्यावहारिक रूप से केवल तीन दिन (27, 29 और 31 अगस्त) ही बचे हैं। इस कम समय और पार्टियों की सुस्त चाल ने दावेदारों की नींद उड़ा दी है।
कोटा का दंगल: आरक्षण की लॉटरी ने पलटी बाजी, दिग्गजों के अरमानों पर फिरा पानी और अंदरखाने का सियासी उथल-पुथल
एजुकेशन सिटी कोटा में इस बार का निकाय चुनाव बेहद रोमांचक, अप्रत्याशित और नाटकीय मोड़ पर आ गया है। कोटा नगर निगम के 100 वार्डों में आरक्षण की नई लॉटरी ने उन तमाम दिग्गजों और स्थापित चेहरों के मंसूबों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है, यह सब सक्रिय नेता आरक्षण की लॉटरी से पहले अपने वार्डों में भाग भाग कर नाली, पटान, सड़क, सफाई,पार्कों की व्यवस्था का कार्य, जनता की समस्या के लिए कैंप लगाना इत्यादि कर रहे थे वह सब मायूस है। इनकी पिछले कई सालों से अपने-अपने पारंपरिक वार्डों से ताल ठोकने की तैयारियां थी। अब इनमें से कई की हालात यह हैं कि रातों-रात बदले समीकरणों के चलते अब ये दिग्गज सुरक्षित जमीन की तलाश में इधर-उधर के वार्डों में अपनी सियासी जमीन टटोलते नजर आ रहे हैं, ताकि किसी तरह कोई पार्टी उन्हें अपना सिंबल थमा दे।
कोटा के हर वार्ड में इस समय टिकट के लिए 4 से 5 दावेदार आपस में ही सिर फुटव्वल की स्थिति में हैं। कई दबंग और सीनियर नेता जिनकी सीटें इस बार महिला या अन्य आरक्षित वर्ग के खाते में चली गईं, वे अब अपनी पत्नियों या परिवार की महिलाओं को मैदान में उतारने के लिए पार्टी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं और अपनी ताकत का अहसास करा रहे हैं। कोटा की राजनीतिक नब्ज टटोलें तो भाजपा की ओर से तो जमीनी स्तर पर पहले ही सर्वे कराए जा चुके हैं और हर संभावित परिस्थिति (चाहे सीट जनरल हो या आरक्षित) के हिसाब से अंदरखाने एक संभावित सूची का कच्चािट्ठा तैयार है। भाजपा के टिकट अमूमन एक ही केंद्र और मजबूत जगह से फाइनल होने के कयास लगाए जा रहे हैं।
इसके विपरीत, कांग्रेस खेमे में गुटबाजी और अंतर्कलह के चलते टिकटों का यह गणित बुरी तरह उलझता दिख रहा है। कोटा में कई वार्ड ऐसे हैं जहां एकतरफा राजनीतिक वर्चस्व के चलते विपक्षी दल को मजबूत प्रत्याशी तक ढूंढने में पसीने छूट रहे हैं। कोटा के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि यदि पार्टी ने मनमुताबिक टिकट नहीं बांटा, तो कई बागी खुलकर निर्दलीय या दूसरी पार्टियों के समर्थन में ताल ठोक देंगे।
चाय-नाश्ते के दौर से गायब हुए ‘टिकटार्थी’, अब जनता के पाले में गेंद
लॉटरी आने से पहले कोटा सहित विभिन्न वार्डों में जिन संभावित प्रत्याशियों ने अपनी जेब ढीली कर रखी थी—मतदाता सूचियों के संशोधन, नुक्कड़ सभाओं, और अपने क्षेत्र में चाय-नाश्ते के दौर चलाने का जो सिलसिला शुरू किया था, वह आरक्षण के फेरबदल के बाद अचानक बंद हो गया है। अब इन दावेदारों का रुख पूरी तरह बदल चुका है कई तो जो दिन-रात दिख रहे थे वर्ड से ही गायब हो गए हैं और जो इक्का-दुक्का बचे हैं साफ कहते नजर आ रहे हैं— ” जिसे पार्टी का अधिकृत टिकट मिलेगा वही अपनी जेब से खर्च करें हमें तो नहीं मिल रहा हम क्यों करें।“ इस अचानक आए यू-टर्न ने स्थानीय स्तर पर चुनावी बैठक और जनसंपर्क ठप हो गया, ऐसे में मोहल्ले के जो लोग सुबह शाम फ्री का चाय नाश्ता कर रहे थे वह भी अब ऐसे लोगों का इंतजार लगाए बैठे हैं।
भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में अंतर और ‘पर्ची राजनीति’
टिकट वितरण को लेकर दोनों प्रमुख दलों के प्रदेश और जिला कार्यालयों में गजब की गहमागहमी है। पार्टी कार्यालयों का नजारा इन दिनों देखने लायक है; हाथ में सिफारिशों की पर्चियां थामे लोग नेताओं के इर्द-गिर्द शक्ति प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं। बगावत और विरोध के डर से दोनों ही दल अपने अधिकृत प्रत्याशियों की घोषणा नामांकन की अंतिम तारीखों के आसपास ही करने की सोची-समझी रणनीति अपना रहे हैं, ताकि टिकट कटने वाले नाराज चेहरे विरोध प्रदर्शन का मौका न पा सकें और टिकट बांटने वाले शीर्ष नेता भी सुरक्षित दूरी बना सकें।
सिंबल का प्रेम बनाम भीतरघात: निर्दलीय बिगाड़ेंगे खेल
नामांकन के पहले दिन आज मैदान में मुख्य रूप से वे निर्दलीय और बागी उतरे हैं, जिन्हें अपनी पार्टी से टिकट मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। टिकट बंटने से पहले हर कोई यही कहता नजर आ रहा है— “टिकट चाहे जिसे मिले, हमें तो बस पार्टी के कमल या पंजे को जिताना है।” लेकिन राजनीति के इस शाश्वत सच को नकारा नहीं जा सकता कि जैसे ही अंतिम सूची बाहर आएगी, यह निष्ठा का सुर बदलकर बगावत और भीतरघात में बदल जाएगा। कई नेताजी लोग अंदरखाने निर्दलीय प्रत्याशियों को पाल-पोसकर और परोक्ष समर्थन देकर अपनों का ही खेल बिगाड़ने की फिराक में हैं।
पैराशूट प्रत्याशी और जनता का विवेक
इस बार के चुनाव में कई वार्डों में नए चेहरों और ‘पैराशूट प्रत्याशियों’ की एंट्री की भी चर्चा है, जिनका वार्ड के विकास या पार्टी के संघर्ष से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा है। इसके अलावा, एक स्थानीय ट्रेंड यह भी है कि जिस दल की प्रदेश में सरकार होती है, अमूमन निगम में बोर्ड भी उसी का बनता है—इस डर से कई वार्डों में तो मजबूत विपक्षी प्रत्याशी तक मिलने मुश्किल हो रहे हैं।
बहरहाल, पार्टियां भले ही अपने समीकरण बैठाती रहें, लेकिन अंततः हर वार्ड की जागरूक जनता ही यह तय करेगी कि स्थानीय समस्याओं और विकास के दावों पर खरा उतरने वाला असली जनसेवक कौन है।
