‘गुप्त फोन कॉल’ और सीधे एसडीएम ऑफिस.. पर्चा दाखिल करो! निकाय चुनाव में टिकट छिपाने का अनोखा माइंड गेम

Written by : Sanjay kumar

जयपुर, 30 अगस्त। राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के चुनाव इन दिनों राजनीति के गलियारों में सबसे बड़ा रोमांचक ड्रामा बन चुके हैं। हालात यह हैं कि मुकाबला अब सिर्फ वोटों की जंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे पहले ही टिकट छिपाने और बगावत कुचलने का ऐसा माइंड गेम शुरू हो गया है, जिसने हर दावेदार की नींद उड़ा दी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों ने अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम अंदरखाने फाइनल कर लिए हैं, लेकिन मजेदार बात यह है कि कोई भी पार्टी अपनी आधिकारिक सूची सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। इसके पीछे की असली वजह जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे कि आखिर क्यों दोनों दलों के बड़े दिग्गज इस बार अपनी ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं से खौफ खाए बैठे हैं।

बगावत के सैलाब से बचने का दांव

चुनावी गलियारों में चर्चा है कि दोनों ही पार्टियों ने बगावत के उस भयानक सैलाब को भांप लिया है जो सूची बाहर आते ही उमड़ सकता था। यही कारण है कि इस बार टिकट पाने वाले भाग्यशाली नेताओं को भी प्रेस विज्ञप्ति या सोशल मीडिया के जरिए नहीं, बल्कि गुप्त फोन कॉल के जरिए सूचना दी जा रही है। निर्देश साफ हैं कि बिना किसी शोर-शराबे के सीधे एसडीएम कार्यालय पहुंचो, नामांकन दाखिल करो और पार्टी का सिंबल जमा करा दो। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसा करके दलों ने रूठे हुए दावेदारों को संभलने, शक्ति प्रदर्शन करने या निर्दलीय मैदान में उतरकर बागी तेवर दिखाने का मौका ही नहीं छोड़ा है।

भाजपा का कड़ा नियंत्रण और निगरानी

स्थिति की नजाकत को भांपते हुए भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने पूरी कमान अपने जिला प्रभारियों के हाथों में सौंप दी है। संभागवार बैठकों के बाद अधिकृत प्रभारियों को ही सीधे सिंबल बांटने और नामांकन प्रक्रिया की पल-पल की निगरानी करने की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी की रणनीति साफ है कि नामांकन की अंतिम तारीख तक विरोधियों को डैमेज कंट्रोल का मौका ही न दिया जाए। स्थानीय समीकरणों को साधने के लिए वरिष्ठ नेता लगातार डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं ताकि अंतिम समय में किसी भी तरह के बड़े आंतरिक विरोध से बचा जा सके।

कांग्रेस खेमे में भी टिकट छिपाने की होड़

वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में भी कमोबेश यही हाल है। हजारों की संख्या में आए आवेदनों के बीच योग्य उम्मीदवार चुनना पहले से ही टेढ़ी खीर साबित हुआ था, और अब सूची सार्वजनिक होने पर पार्टी के भीतर बड़े पैमाने पर बगावत का खतरा मंडरा रहा है। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने साफ निर्देश दिए हैं कि जहां तक संभव हो सूची को सार्वजनिक न किया जाए, ताकि पार्टी के भीतर टिकट कटने वाले संभावित बागी उम्मीदवार समय रहते कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन या निर्दलीय नामांकन दर्ज न करा सकें।

प्रेस वार्ता जारी कर नाम की होगी घोषणा

रणनीति के अगले चरण में दोनों ही दलों ने यह तय किया है कि नामांकन की पूरी प्रक्रिया और अंतिम तिथि बीत जाने के बाद ही प्रेस वार्ता आयोजित की जाएगी। जयपुर समेत प्रदेश के सभी जिलों में अधिकृत जिला प्रभारी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मैदान में उतरे पार्टी के असली और अधिकृत प्रत्याशियों के नामों का आधिकारिक ऐलान करेंगे। तब तक किसी भी सूची को सार्वजनिक न करने की सख्त पाबंदी है ताकि पूरी नामांकन प्रक्रिया पूरी तरह से गोपनीय और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके।

मोबाइल की घंटी और अनिश्चितता का खेल

कांग्रेस के सेंट्रल वॉररूम चेयरमैन जसवंत गुर्जर के अनुसार, पार्टी के जिला प्रभारियों को सिंबल सौंप दिए गए हैं और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर ही सूची जारी करने या सीधे उपखंड अधिकारियों को सिंबल देने की अंतिम रणनीति तय की जा रही है। यानी अबकी बार राजस्थान के निकाय चुनाव में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसका फैसला तो बाद में होगा, लेकिन टिकट मिलने से पहले ही मोबाइल की घंटी बजते ही दावेदारों की धड़कनें तेज हो चुकी हैं। नामांकन की अंतिम तिथि बीतने और जिला प्रभारियों द्वारा प्रेसवार्ता में नाम आधिकारिक रूप से सार्वजनिक करने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि इस खामोश सियासी खेल में किस पार्टी की रणनीति सफल रही और किसे अपनों की बगावत का भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है।

आसान शब्दों में पूरी बात का सार

इस पूरी राजनीतिक हलचल का सीधा और आसान मतलब यह है कि राजस्थान के इन 309 निकायों में दोनों ही बड़ी पार्टियों (भाजपा और कांग्रेस) को डर है कि अगर उन्होंने अपने उम्मीदवारों के नामों की सूची पहले ही सार्वजनिक कर दी, तो जिन कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं मिलेगा वे नाराज होकर बगावत कर देंगे या पार्टी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने खड़े हो जाएंगे। इसी बगावत और पार्टी के भीतर फूट के डर से दोनों दलों ने एक बहुत ही चालाक तरीका निकाला है। इसके तहत वे उम्मीदवारों के नाम अखबारों या टीवी पर छापने के बजाय चुपचाप फोन पर बता रहे हैं, ताकि उम्मीदवार सीधे जाकर अपना पर्चा (नामांकन) भर दे और किसी को विरोध करने का मौका ही न मिले। नामांकन का काम पूरा होने के बाद ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पूरी सूची सबके सामने लाई जाएगी।

Pramukh Samvad

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