Written by : Sanjay kumar
कोटा, 4 सितंबर। राजस्थान सरकार की बहुप्रचारित राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) आज राज्य के लाखों सरकारी कर्मचारियों, पेंशनर्स और उनके परिवारों के लिए वरदान साबित होने के बजाय एक भयंकर मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का जरिया बन चुकी है। हर महीने इन कर्मचारियों के वेतन से अनिवार्य रूप से मोटी राशि इस स्वास्थ्य मद में काट ली जाती है, लेकिन जब बात इलाज की आती है, तो इन्हें निजी अस्पतालों के स्वघोषित और अमानवीय नियमों के आगे घुटने टेकने पड़ते हैं। अस्पतालों की यह खुली मनमानी इस बात का प्रमाण है कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर से सरकार का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है और आम कर्मचारी इन निजी संस्थानों की दया पर जीने को मजबूर हैं।
सरकार का खजाना भर रहे कर्मचारी, लेकिन अस्पतालों के तानाशाही फरमानों से हो रहे प्रताड़ित
राज्य के सरकारी महकमों में काम करने वाले बाबू, शिक्षक और अधिकारी हर महीने अपने पसीने की कमाई से आरजीएचएस के नाम पर पैसे कटवा रहे हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें और उनके बुजुर्ग माता-पिता को कैशलेस इलाज मिल सके। विडंबना यह है कि सरकार और चिकित्सा विभाग के स्पष्ट नियमों के बावजूद, निजी अस्पतालों और डॉक्टरों ने अपनी तिजोरी भरने के लिए समानांतर कानून चला रखे हैं। कोटा सहित पूरे प्रदेश में कई ऐसे पंजीकृत अस्पताल हैं जहां रविवार के दिन आरजीएचएस सेवाएं पूरी तरह बंद कर दी जाती हैं, मानो बीमारी और स्वास्थ्य संकट कैलेंडर देखकर या छुट्टियों के दिन देखकर आते हों।
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कैश मरीजों को रेड कार्पेट और आरजीएचएस लाभार्थियों के लिए अपमानजनक कोटा प्रणाली
निजी चिकित्सालयों की तानाशाही का आलम यह है कि डॉक्टरों ने मरीजों में भी भेद करना शुरू कर दिया है। कई प्रतिष्ठित कहे जाने वाले अस्पतालों में यह अघोषित नियम बना दिया गया है कि डॉक्टर पहले नकद (कैश) भुगतान करने वाले दस मरीजों को देखेंगे और उसके बाद कहीं जाकर एक आरजीएचएस मरीज की सुध ली जाएगी। इसके अलावा, कई अस्पतालों ने रोजाना केवल 10 आरजीएचएस मरीज देखने का कोटा तय कर रखा है, जिससे दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले बीमार कर्मचारियों को सुबह लंबी कतार में लगने के बाद भी बैरंग वापस लौटना पड़ता है।
पर्ची से लेकर दवाइयों तक की पाबंदियां, दोपहर बारह बजे के बाद आरजीएचएस मरीजों के लिए बंद हो जाते हैं दरवाजे
अस्पतालों की लापरवाही और लूट का दायरा यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि दोपहर बारह बजते ही आरजीएचएस की पर्ची काटने पर रोक लगा दी जाती है। दिन के वक्त अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर बाहर से महंगी दवाइयां कैश में खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, और यदि किसी को योजना के तहत दवा चाहिए तो उसे शाम चार बजे के बाद आने का तुगलकी फरमान सुनाया जाता है। यह प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी और लचर नियंत्रण का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां निजी अस्पताल दिन के उजाले में मरीजों का शोषण कर रहे हैं और संबंधित अधिकारी आंखें मूंदकर बैठे हैं।
कमजोर होती प्रशासनिक पकड़ और सरकार की लाचारी के आगे घुटने टेकता सिस्टम
इन तमाम गंभीर शिकायतों के बाद भी अस्पतालों पर किसी प्रकार का प्रभावी अंकुश न लग पाना राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की नीति व नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रदेश की सत्ता पर काबिज सरकार इन निजी अस्पतालों के आड़े हाथों इतनी लाचार हो चुकी है कि वह कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए कोई ठोस और दंडात्मक कदम उठाने से बच रही है। जब जनता के नुमाइंदे और महकमे के अधिकारी इस संगठित लूट पर चुप्पी साध लेते हैं, तो यह सरकारी संरक्षण जैसा प्रतीत होता है, जिससे आम कर्मचारी अपने आपको पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
जनता की सुप्त आवाज बनेगी हुक्मरानों की नींद खराब, दोषियों पर तुरंत कार्रवाई की अंतिम चेतावनी
अब वक्त आ गया है कि सरकारी कर्मचारियों का यह सुलगता आक्रोश केवल दबी जुबान की शिकायत न रहकर एक जन आंदोलन का रूप ले, जो सरकार और प्रशासन की गहरी नींद को झकझोर कर रख दे। कर्मचारी संगठनों और पीड़ित नागरिकों की यह साफ मांग है कि आरजीएचएस के नाम पर लूट मचाने वाले ऐसे बेलगाम निजी अस्पतालों का पैनल तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले डॉक्टरों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो। यदि सरकार ने अभी भी अपनी लाचारी का चोला नहीं उतारा और इन व्यावसायिक अस्पतालों पर नकेल नहीं कसी, तो आने वाले समय में यह व्यवस्था राज्य सरकार के पतन का सबसे बड़ा सबब बन जाएगी।
