Written by : Sanjay kumar
जयपुर, 22 अगस्त। राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी ‘राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम’ (RGHS) वर्तमान में राजस्थान के निजी चिकित्सा माफियाओं की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। मरीजों को बेहतर और सुलभ चिकित्सा प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई यह योजना आज निजी अस्पतालों के लालच और सरकारी तंत्र की ढिलाई के कारण भ्रष्टाचार का पर्याय बनती जा रही है। हाल ही में हुए डेटा विश्लेषण ने इस भयावह सच्चाई को उजागर किया है कि कैसे निजी अस्पताल एक ही बीमारी के नाम पर मरीजों को बार-बार बुलाकर, सरकारी नियमों को दरकिनार कर अपनी जेबें भर रहे हैं।
परियोजना अधिकारी के खुलासे से सामने आया फर्जीवाड़े का सच
RGHS की परियोजना अधिकारी डॉ. निधि पटेल ने इस पूरे खेल की परतों को उजागर करते हुए गंभीर चिंता जताई है। उनके हवाले से यह बात सामने आई है कि जांचों को बेवजह अलग-अलग कराए जाने के कारण मरीजों को अनावश्यक रूप से कई बार अस्पताल के चक्कर काटने पड़े हैं। परियोजना अधिकारी के अनुसार, इस धोखेधड़ी का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं और बुजुर्ग मरीज हुए हैं, जिन्हें मामूली सी स्वास्थ्य समस्या के लिए भी बार-बार अस्पताल बुलाया गया। इस तरह की कार्यप्रणाली से न केवल मरीजों को भारी मानसिक और शारीरिक परेशानी उठानी पड़ी है, बल्कि यह सीधे तौर पर RGHS जैसी जनकल्याणकारी व्यवस्था के घोर दुरुपयोग और उसकी पवित्रता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
प्री-ऑथराइजेशन के चक्रव्यूह से बचने का शातिर हथकंडा
RGHS के नियमों के अनुसार, यदि किसी मरीज की जांच का खर्च 2,000 रुपये से अधिक है, तो अस्पताल को पहले इसके लिए ‘प्री-ऑथराइजेशन’ लेना अनिवार्य होता है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि अनावश्यक और महंगी जांचों को रोका जा सके। लेकिन निजी अस्पतालों ने इसका तोड़ निकाल लिया है। ये अस्पताल मरीजों को एक बार में पूरी जांच कराने के बजाय, उन्हें 3 से 4 बार अस्पताल बुलाते हैं और जांचों को टुकड़ों में विभाजित कर देते हैं। इस तरह हर बिल 2,000 रुपये से कम का बनता है, जिससे उन्हें किसी भी प्रकार के सरकारी सत्यापन या प्री-ऑथराइजेशन की जरूरत ही नहीं पड़ती। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं है, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य के साथ एक सोची-समझी धोखाधड़ी है।
अस्पतालों के साथ क्या सरकारी अधिकारियों की भी साठगांठ है?
आज आम जनता के मन में यह सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या यह गोरखधंधा केवल निजी अस्पतालों की बदौलत चल रहा है? जिस तरह से इन अस्पतालों ने सरकारी प्रणाली की कमजोरियों को पहचाना और उसका फायदा उठाया, उससे प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी कटघरे में खड़ी होती है। क्या योजना के मॉनिटरिंग सेल में बैठे अधिकारी इतने नाकाबिल हैं कि उन्हें एक महीने में 238 लाभार्थियों के साथ हो रहे 479 संदिग्ध प्रकरणों की भनक तक नहीं लगी? जनता का मानना है कि इतनी बड़ी अनियमितता बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत या ‘सुविधा शुल्क’ (घूस) के संभव नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि निजी अस्पताल पैसे के दम पर सरकारी फाइलों को दबाने में सफल हो रहे हैं और सरकारी मशीनरी मूकदर्शक बनी हुई है।
मरीजों की मजबूरी और संवेदनहीनता की हद
इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा प्रताड़ित वे बुजुर्ग और महिलाएं हुए हैं, जिन्हें अपनी बीमारी के इलाज के लिए बार-बार अस्पताल के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। एक कमजोर मरीज, जिसे डॉक्टर की सलाह पर आराम करना चाहिए, उसे अस्पताल के काउंटर पर लाइन में लगने और बार-बार रिपोर्ट लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अस्पताल प्रबंधन के लिए मरीज अब इंसान नहीं, बल्कि ‘क्लेम प्राप्ति का साधन’ बन गए हैं। एक मामूली बीमारी के लिए तीन-तीन दिन तक अस्पताल बुलाना, जबकि वह जांच एक ही दिन में हो सकती थी, यह स्पष्ट करता है कि अस्पतालों का मकसद इलाज नहीं, बल्कि मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर सरकारी फंड को लूटना है।
मामूली जुर्माने से नहीं, अब मान्यता रद्दीकरण और बड़ी कार्रवाई की आवश्यकता
विभाग ने 50 निजी अस्पतालों और 60 चिकित्सकों को जांच के घेरे में लेने की बात तो कही है, लेकिन आम जनता को अब कागजी कार्रवाई से विश्वास उठ चुका है। क्या सरकार इन अस्पतालों पर केवल नाममात्र का जुर्माना लगाकर इन्हें छोड़ देगी? यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति रखती है, तो उसे अपनी कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। केवल अस्पतालों को ‘चिन्हित’ करना काफी नहीं है; दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक अस्पताल की RGHS मान्यता को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए। साथ ही, उन सभी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो, जिनकी देखरेख में यह लूट फल-फूल रही थी।
कठोर दंड प्रावधानों की मांग
सरकारी धन का दुरुपयोग एक गंभीर आर्थिक अपराध है। अतः सरकार को ऐसे प्रावधान करने चाहिए कि जो भी अस्पताल इस प्रकार के बिल स्प्लिटिंग (जांच बांटने) के खेल में लिप्त पाया जाए, उससे न केवल वसूले गए क्लेम की रिकवरी हो, बल्कि उस पर भारी आर्थिक दंड भी लगाया जाए। इसके अतिरिक्त, मरीजों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए अस्पताल प्रशासन के खिलाफ आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज होना चाहिए। यदि सरकार ने इस बार भी ‘बड़ी मछली’ को छोड़कर केवल औपचारिकता पूरी की, तो आम जनता का इस योजना से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा। यह वक्त है कि सरकार निजी अस्पतालों की इस निरंकुशता पर नकेल कसे और यह सुनिश्चित करे कि जनता का पैसा मरीजों की सेवा में लगे, न कि निजी अस्पतालों की तिजोरी भरने में।
