Written by : Sanjay kumar
जयपुर, 22 अगस्त। राजस्थान में शिक्षा के बुनियादी ढांचे के खोखले दावों की पोल खोलते हुए भजनलाल सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए आंकड़े राज्य की शिक्षा व्यवस्था की दयनीय और लाचार स्थिति को पूरी तरह बेनकाब करते हैं। एक तरफ सरकार बड़े-बड़े बजट और विकास के दावे करने में जुटी है, वहीं धरातल पर सच्चाई यह है कि प्रदेश के सैकड़ों मासूम बच्चे बिना छत और बुनियादी सुविधाओं के पढ़ाई करने को मजबूर हैं। सरकार के ये आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी तंत्र किस हद तक लापरवाह बना हुआ है।
भवन विहीन स्कूल: खुले आसमान के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर मासूम
राज्य की विडंबना देखिए कि आज के आधुनिक दौर में भी प्रदेश के 611 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जिनके पास अपना खुद का भवन तक नहीं है। इन भवन विहीन स्कूलों में 10 बालिका विद्यालय भी शामिल हैं, जो बालिकाओं की सुरक्षा, गरिमा और उनकी शिक्षा के प्रति सरकारी तंत्र की गंभीर उदासीनता पर बड़ा सवालिया निशान खड़े करते हैं।
इस गंभीर संकट की मार झेल रहे जिलों के आंकड़े इस प्रकार हैं:
- झालावाड़: 67 स्कूल भवन विहीन
- जोधपुर: 42 स्कूल भवन विहीन
- जयपुर: 38 स्कूल भवन विहीन
- बाड़मेर: 36 स्कूल भवन विहीन
- बांसवाड़ा: 31 स्कूल भवन विहीन
- डूंगरपुर: 31 स्कूल भवन विहीन
शौचालय विहीन स्कूल: स्वच्छता के दावों को ठेंगा दिखाती बदहाल व्यवस्था
एक तरफ देश और प्रदेश में स्वच्छता अभियानों के ढोल पीटे जाते हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षा के मंदिरों में छात्र-छात्राओं के लिए शौचालय जैसी अत्यंत बुनियादी सुविधा न होना बेहद शर्मनाक है। राजस्थान के 2,047 सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए शौचालय उपलब्ध नहीं हैं, जिससे विशेषकर बालिकाओं को रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
इस व्यवस्था की बदहाली को बयां करते जिलावार आंकड़े निम्नलिखित हैं:
- बांसवाड़ा: 188 स्कूल शौचालय विहीन
- डूंगरपुर: 124 स्कूल शौचालय विहीन
- उदयपुर: 98 स्कूल शौचालय विहीन
- बीकानेर: 84 स्कूल शौचालय विहीन
- झालावाड़: 81 स्कूल शौचालय विहीन
पेयजल संकट: बूंद-बून पानी को तरस रहे नौनिहाल
शिक्षा प्राप्त करने आने वाले मासूमों को हलक तर करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। राज्य के 1,049 विद्यालयों में बच्चों को पेयजल की कोई सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिससे उन्हें या तो घर से पानी लाना पड़ता है या फिर असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
पेयजल की समस्या से जूझते प्रमुख जिले इस प्रकार हैं:
- दौसा: 96 स्कूल पेयजल विहीन
- उदयपुर: 70 स्कूल पेयजल विहीन
- अलवर: 65 स्कूल पेयजल विहीन
- करौली: 60 स्कूल पेयजल विहीन
- बांसवाड़ा: 58 स्कूल पेयजल विहीन
बांसवाड़ा और आदिवासी अंचलों के सबसे बदतर हालात
आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह साफ हो जाता है कि आदिवासी बहुल अंचल और ग्रामीण क्षेत्रों के हालात सबसे ज्यादा दयनीय हैं। बांसवाड़ा जिला ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण क्षेत्र है जो भवन विहीन, शौचालय विहीन और पेयजल विहीन—तीनों ही प्रमुख श्रेणियों के टॉप-5 जिलों में शामिल है। इसके अलावा डूंगरपुर और झालावाड़ जैसे जिले भी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी से जूझ रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सरकार के विकास के दावे केवल कागजी विज्ञापनों तक ही सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत इन क्षेत्रों में पूरी तरह लाचार नजर आती है।
खोखले आश्वासन और कागजी बजट का खेल
सरकार द्वारा विधानसभा में यह जरूर बताया गया है कि विद्यालयों की मरम्मत और जर्णोद्धार के लिए बजट प्रावधान किए जा रहे हैं तथा हर साल हजारों करोड़ रुपए के खाके तैयार किए जा रहे हैं। परंतु सवाल यह उठता है कि जब पिछले इतने वर्षों से प्रशासनिक नीतियां बनाई जा रही हैं, तब भी आज हजारों स्कूल इन मूलभूत सुविधाओं से क्यों वंचित हैं? कागजों पर बनने वाले बड़े-बड़े वित्तीय खाके और घोषणाएं तब तक बेमानी हैं जब तक एक भी बच्चा बिना छत, बिना पानी और बिना शौचालय के स्कूल जाने को विवश रहेगा। यह लाचार सरकार की कार्यशैली पर सीधा प्रहार है जो भविष्य के निर्माताओं का जीवन अंधकारमय बना रही है।
