Story: Sanjay kumar
नई दिल्ली: 5 सितंबर। भारतीय बैंकिंग व्यवस्था और देश की सियासत में हमेशा से एक बहुत बड़ा और संवेदनशील सवाल यह उठता रहा है कि आखिर सरकारें एक के बाद एक बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों के भारी-भरकम कर्ज़ क्यों माफ़ करती जाती हैं। दूसरी तरफ़, आम आदमी जब बैंक या किसी छोटी फाइनेंस कंपनी से मामूली कर्ज़ लेता है और किन्हीं वजहों से उसे समय पर चुका नहीं पाता, तो रिकवरी एजेंटों या फ़ाइनेंस कंपनियों के गुंडे उसे मानसिक और शारीरिक रूप से किस कदर प्रताड़ित करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। हालांकि सुभाष चंद्रा से जुड़ा मामला सीधे तौर पर बैंक का कर्ज़ माफ़ होने का नहीं, बल्कि गारंटी देने वाले व्यक्ति से उस कर्ज़ की वसूली का है, लेकिन इससे यह मूल सवाल फिर ज़िंदा हो जाता है कि आखिर बैंकों द्वारा बांटे गए हज़ारों-लाखों करोड़ रुपए के कर्ज़ वसूल क्यों नहीं हो पाते और जब नहीं होते, तो उन्हें औने-पौने दामों में क्यों निपटा दिया जाता है। यह मुद्दा तब और भी ज़्यादा गंभीर हो जाता है जब हम राजनीतिक बयानों और वादों के आईने में इसकी सच्चाई को तलाशने की कोशिश करते हैं।
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राजनीतिक छींटाकशी के बीच क्या सचमुच पानी की तरह बहाया जा रहा है जनता का पैसा?
नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले और उसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी के नेता कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह की सरकार पर लगातार यह गंभीर आरोप लगाते रहे हैं कि वह अपने चुनिंदा पूंजीपति मित्रों और उद्योगपतियों को आर्थिक फ़ायदा पहुँचाने के लिए सरकारी बैंकों का पैसा पानी की तरह बहा रही है। लेकिन विडंबना यह है कि सत्ता बदलने के बाद भी ऐसे मामलों में कमी आने के बजाय यह संकट और अधिक व्यापक रूप ले चुका है। हाल ही में वित्त राज्यमंत्री द्वारा लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक के हवाले से यह बात सामने आई कि पिछले 12 वर्षों में देश के बैंकों ने बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के लगभग 10 लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ या तो राइट ऑफ़ कर दिए या उन्हें बट्टे खाते में डाल दिया। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश के वित्तीय तंत्र पर कितना भारी दबाव है और किस तरह से जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा कागजों पर डूबा हुआ घोषित किया जा रहा है।
क्या डूबे हुए कर्ज़ों की असली ज़िम्मेदार पिछली सरकारें हैं या खेल अब भी जारी है?
आरबीआई के आधिकारिक आंकड़ों पर अगर गौर करें तो यह साफ होता है कि साल 2014-15 से लेकर 2023-24 के बीच बैंकों ने कुल 16.35 लाख करोड़ रुपए के एनपीए राइट ऑफ़ किए, जिनमें से अकेले 9.28 लाख करोड़ रुपए बड़े उद्योगों और सर्विस सेक्टर से जुड़े हुए थे। हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे तौर पर मोदी सरकार द्वारा दिए गए नए कर्ज़ों की माफ़ी मान लेना एक भूल होगी, क्योंकि इस भारी-भरकम राशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन कर्जों का था जो साल 2014 से बहुत पहले यानी पिछली सरकारों के कार्यकाल में बांटे जा चुके थे। जब मोदी सरकार के आने के बाद संपत्तियों की गुणवत्ता की समीक्षा यानी एसेट क्वॉलिटी रिव्यू (AQR) और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की प्रक्रिया शुरू हुई, तब जाकर इन पुरानी सड़ी-गली और डूबी हुई परिसंपत्तियों की सही तस्वीर देश के सामने आई। इसके बावजूद इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि मौजूदा सरकार के दौर में भी ऐसे कर्ज़ों के डूबने और उन्हें बट्टे खाते में डालने का सिलसिला थमा नहीं है।
क्या बट्टे खाते में डालने का मतलब सचमुच उद्योगपतियों का कर्ज़ हमेशा के लिए माफ़ होना है?
आम जनता के मन में अक्सर यह बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है कि बैंक द्वारा किसी कर्ज़ को राइट ऑफ़ कर देने या बट्टे खाते में डाल देने का मतलब यह होता है कि उस उद्योगपति या बड़े व्यापारी की उस कर्ज़ को चुकाने की कानूनी ज़िम्मेदारी हमेशा के लिए खत्म हो गई है। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट होती है; बैंक अपने आंतरिक बहीखातों या बैलेंस शीट को साफ-सुथरा दिखाने के लिए उस डूबे हुए कर्ज़ को अपने खाते से हटा देता है या उसे नुकसान मान लेता है, परंतु देनदार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और वसूली के प्रयास देश के कानूनों के तहत लगातार जारी रहते हैं। यदि भविष्य में किसी कानूनी प्रक्रिया, संपत्ति की जब्ती या व्यापारिक समझौते के जरिए वह पैसा वापस बैंक के पास आ जाता है, तो वह बैंक के लिए किसी गड़े हुए खजाने के हाथ लगने जैसा साबित होता है। इसलिए बट्टे खाते में डाले जाने को पूरी तरह से कर्ज़ की माफ़ी समझ लेना बैंकिंग व्यवस्था के तकनीकी पहलुओं को पूरी तरह से न समझना है।
बैंकों को चूना लगाने वाला ‘हेयरकट’ का फॉर्मूला क्या गरीबों के लिए भी लागू होता है?
सरकार ने डूबते हुए कर्ज़ों की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए साल 2016 में इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी कानून को लागू किया था, जिसका मुख्य उद्देश्य यह था कि जो कंपनियां अपना कर्ज़ चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हो चुकी हैं, उन्हें किसी नए खरीदार को बेच दिया जाए और उससे जो भी अधिकतम संभव धन मिले, उसे बैंकों के बीच बांट दिया जाए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जो रकम बैंकों को वसूल नहीं हो पाती है, उसे वित्तीय भाषा में ‘हेयरकट’ का नाम दिया जाता है; उदाहरण के लिए यदि 100 रुपए के कुल कर्ज़ में से 10 रुपए की वसूली नहीं हो पाती है, तो बैंक 90 रुपए पर ही संतोष कर लेते हैं और बाकी के 10 रुपए को हेयरकट मान लिया जाता है ताकि पूरा पैसा डूबने से तो कम से कम कुछ राहत मिल सके। लेकिन यह सिद्धांत तब चिंताजनक बन जाता है जब यह हेयरकट मात्र 10 या 20 फीसदी होने के बजाय 80 से 90 फीसदी तक पहुंच जाता है, जिसका मतलब यह होता है कि बैंक को अपने मूल धन का लगभग पूरा हिस्सा ही छोड़ना पड़ रहा है।
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कई बार आईबीसी प्रक्रिया के तहत यह कदम उठाना मजबूरी बन जाता है, क्योंकि मान लीजिए किसी दिवालिया हो रही कंपनी पर 10,000 करोड़ रुपए का भारी कर्ज बकाया है और बैंक लेनदार किसी नए खरीदार से मात्र 3,000 करोड़ रुपए लेकर ही मामले को रफा-दफा करने पर इसलिए मजबूर हो जाते हैं कि उन्हें यह डर सता रहा होता है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो शायद भविष्य में एक हजार करोड़ रुपए की भी वसूली नहीं हो पाएगी। अगर हम इसके व्यावहारिक उदाहरण देखें तो एस्सार स्टील के मामले में लगभग 77 फीसदी तक की अच्छी वसूली हुई, लेकिन दूसरी तरफ लैन्को थर्मल पावर जैसे गंभीर मामले भी सामने आए जहां 33,331 करोड़ रुपए के दावों के मुकाबले केवल 136 करोड़ रुपए ही वसूल हो पाए, जो कि 99.6 फीसदी का एक बहुत बड़ा हेयरकट था। इसके अलावा, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (2014-2019) के दौरान जहां बड़े उद्योगों के लगभग 3.88 लाख करोड़ रुपए के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए थे, वहीं मोदी 2.0 यानी 2019 से 2024 के बीच यह बढ़कर 5.39 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गए, जिससे यह साबित होता है कि यह केवल पिछली सरकार की विरासत नहीं है बल्कि डीएचएफएल, फ्यूचर रिटेल और सुभाष चंद्रा जैसे नए मामले भी लगातार सामने आए हैं, जिन पर अब देश की सर्वोच्च अदालतों और जनता की पैनी नजर बनी हुई है।
क्या आपको लगता है कि आईबीसी जैसे मौजूदा कानूनों में बदलाव करके बैंकों को बड़े उद्योगपतियों से पैसा वसूलने के लिए और अधिक कड़े अधिकार दिए जाने चाहिए?
