राजस्थान वन विभाग में हड़कंप? PMO पहुंची शिकायत पर नए PCCF की नियुक्ति टली!

जयपुर, 28 सितंबर। राजस्थान वन विभाग के सर्वोच्च पद Principal Chief Conservator of Forests एवं Head of Forest Force (PCCF-HoFF) पर नए अधिकारी की नियुक्ति को लेकर चल रही प्रक्रिया अचानक रुक गई है। 24 सितंबर 2026 को प्रस्तावित चयन समिति की बैठक को कार्मिक विभाग ने एक दिन पहले 23 सितंबर को ‘अपरिहार्य कारणों’ का हवाला देते हुए स्थगित कर दिया। सरकार की ओर से बैठक टालने का कोई विशिष्ट कारण सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया है और नई तारीख भी अभी घोषित नहीं की गई है।

मौजूदा PCCF-HoFF अरिजीत बनर्जी अक्टूबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में नए वन विभाग प्रमुख के चयन की प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक हलकों में विशेष निगाह बनी हुई है। राजस्थान वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर फिलहाल अरिजीत बनर्जी को PCCF-HoFF और पवन कुमार उपाध्याय, शिखा मेहरा तथा अनुराग भारद्वाज को विभिन्न PCCF स्तर के पदों पर दर्ज किया गया है।

बैठक स्थगित होने के बीच शिकायतों का मामला सामने आया

चयन समिति की बैठक स्थगित होने के घटनाक्रम के साथ वरिष्ठ अधिकारी पवन कुमार उपाध्याय के संबंध में की गई एक शिकायत भी चर्चा में आई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कोटा निवासी अधिवक्ता एवं पर्यावरण कार्यकर्ता तपेश्वर सिंह भाटी ने मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास को प्रतिनिधित्व देकर संबंधित अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच होने तक उन्हें शीर्ष पद के लिए विचार से अलग रखने की मांग की है। प्रतिनिधित्व में प्रधानमंत्री को 1 और 9 सितंबर को भेजी गई पूर्व शिकायतों का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सरकार के स्थगन आदेश में शिकायत को बैठक टाले जाने का कारण नहीं बताया गया है। इसलिए यह कहना कि बैठक केवल शिकायत के कारण ही रद्द हुई, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से पुष्ट नहीं होता। मुख्य सचिव कार्यालय ने मीडिया को बताया है कि PCCF-HoFF की चयन प्रक्रिया निर्धारित समयसीमा और स्थापित नियमों एवं प्रक्रिया के अनुसार पूरी की जाएगी।

अलवर और बारां से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप

शिकायत में अलवर और बारां में वन कार्यों से संबंधित विभागीय जांचों को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अलवर मामले में करीब 17 करोड़ रुपये की संदिग्ध वित्तीय अनियमितताओं का शुरुआती उल्लेख था, जिसे बाद में लगभग 21 करोड़ रुपये का बताया गया। यह मामला सात Village Forest Protection and Management Committees से जुड़े कार्यों से संबंधित बताया गया है।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि मामले की विभागीय जांच और आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया प्रभावित हुई या उसमें देरी हुई। प्रतिनिधित्व में यह भी दावा किया गया है कि एक जांच में मामले को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो तक भेजने की सिफारिश की गई थी, लेकिन उसे सरकार तक भेजने में समय लगा। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और इन्हें किसी अधिकारी के विरुद्ध स्थापित अपराध या दोषसिद्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता।

बारां की AFD परियोजना भी चर्चा के केंद्र में

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू बारां में चल रही राजस्थान फॉरेस्ट्री एंड बायोडायवर्सिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (RFBDP) से जुड़ा है। यह परियोजना फ्रांस की विकास एजेंसी Agence Française de Développement (AFD) के सहयोग से राजस्थान के 13 जिलों में संचालित हो रही है।

राजस्थान वन विभाग के आधिकारिक विवरण के अनुसार इस परियोजना की कुल लागत 1,693.91 करोड़ रुपये है। इसमें AFD का योगदान 1,185.29 करोड़ रुपये और राजस्थान सरकार का हिस्सा 508.62 करोड़ रुपये है। परियोजना आठ वर्षों की है और इसका उद्देश्य पूर्वी राजस्थान में वन पारिस्थितिकी, जैव विविधता, प्राकृतिक वनों, वन्यजीव संरक्षण तथा वन-आश्रित समुदायों की आजीविका को मजबूत करना है।

AFD की आधिकारिक वेबसाइट भी राजस्थान की इस परियोजना को 2023 से 2031 तक चलने वाली परियोजना के रूप में दर्ज करती है और इसकी AFD वित्तीय सहायता 140 मिलियन यूरो बताती है।

शिकायत में बारां से जुड़े कुछ कार्यों और जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत में यह आरोप है कि एक पूर्व जांच को दोबारा खोला गया तथा AFD की ओर से कथित तौर पर स्पष्टीकरण मांगा गया। इन दावों को भी फिलहाल शिकायत में लगाए गए आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि किसी अंतिम जांच निष्कर्ष के रूप में।

सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले का भी हवाला

चयन प्रक्रिया को लेकर दिए गए प्रतिनिधित्व में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2011 के Centre for Public Interest Litigation बनाम Union of India मामले का हवाला दिया गया है। यह मामला तत्कालीन केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पी.जे. थॉमस की नियुक्ति से संबंधित था।

सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में नियुक्ति प्रक्रिया की वैधानिकता और निर्णय प्रक्रिया में ‘institutional integrity’ के महत्व पर चर्चा की थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि उसका निर्णय उस नियुक्ति की कानूनी वैधता की न्यायिक समीक्षा तक सीमित था और लंबित मामलों के गुण-दोष पर टिप्पणी नहीं की गई थी।

इसी न्यायिक सिद्धांत का हवाला देते हुए शिकायतकर्ता ने राजस्थान में प्रस्तावित नियुक्ति के संदर्भ में संबंधित अधिकारी के खिलाफ लंबित शिकायतों और जांचों को चयन के दौरान ध्यान में रखने की मांग की है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का 2011 का फैसला अपने तथ्यों और कानूनी संदर्भ में अलग मामला था; इसलिए उसका राजस्थान की वर्तमान नियुक्ति पर स्वतः लागू होना मान लेना उचित नहीं होगा।

अब नजर नई चयन तारीख पर

वन विभाग के नए प्रमुख के चयन की प्रक्रिया में फिलहाल तीन वरिष्ठ अधिकारियों के नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं। इनमें पवन कुमार उपाध्याय, अनुराग भारद्वाज और शिखा मेहरा शामिल हैं। राजस्थान वन विभाग की मौजूदा आधिकारिक निर्देशिका में उपाध्याय PCCF (Administration) एवं PCCF (Coordination), शिखा मेहरा PCCF (Development) और अनुराग भारद्वाज PCCF (IT) के रूप में दर्ज हैं।

अब मुख्य सवाल यह है कि स्थगित चयन बैठक की नई तारीख कब तय होती है और चयन समिति शिकायतों एवं संबंधित विभागीय मामलों को किस तरह रिकॉर्ड पर लेती है। सरकार ने फिलहाल इतना स्पष्ट किया है कि चयन प्रक्रिया निर्धारित समयसीमा और स्थापित नियमों के अनुसार पूरी की जाएगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्थान वन विभाग के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद की नियुक्ति को फिलहाल चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर अक्टूबर के अंत में मौजूदा वन प्रमुख की सेवानिवृत्ति प्रस्तावित है, वहीं दूसरी ओर शीर्ष पद के दावेदारों से जुड़ी शिकायतों ने चयन प्रक्रिया में अतिरिक्त प्रशासनिक और कानूनी सावधानी की जरूरत को सामने ला दिया है।

Pramukh Samvad

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