Written by : प्रमुख संवाद
बारां, 13 फरवरी 2026।
बारां जिले के शाहबाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से राज्य की चिकित्सा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करने वाला मामला सामने आया है। चार चिकित्सकों की पदस्थापना के बावजूद मरीजों को समय पर डॉक्टरों द्वारा उपचार नहीं मिलना स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
शुक्रवार को प्रातः लगभग 11:15 बजे ओपीडी कक्ष में संविदाकर्मी नर्सिंग ऑफिसर हेमंत मेहता को चिकित्सक की कुर्सी पर बैठकर मरीजों का परीक्षण एवं उपचार करते हुए देखा गया। आरोप है कि इस दौरान चिकित्सक अपने कक्ष से बाहर नहीं आए और मरीजों की प्रत्यक्ष जांच नहीं की। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब नर्सिंग स्टाफ का दायित्व सामान्यतः चिकित्सक द्वारा लिखित परामर्श के अनुसार उपचार प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होता है, न कि स्वतंत्र रूप से दवा, जांच या इंजेक्शन निर्धारित करना।
स्थानीय स्तर पर यह भी सामने आया है कि अस्पताल में कई बार डॉक्टर अपने कक्ष में ही सीमित रहते हैं और ओपीडी में मरीजों को नर्सिंग स्टाफ के भरोसे छोड़ दिया जाता है। यह व्यवस्था न केवल चिकित्सा मानकों के विरुद्ध है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और अधिकारों के साथ भी समझौता है।
इसी क्रम में यह भी देखा गया कि दंत रोग विशेषज्ञ द्वारा दांतों से इतर सामान्य रोगियों को भी देखा जा रहा है। यद्यपि दंत चिकित्सक दांत, मसूड़ों, मुंह एवं जबड़े से संबंधित रोगों का उपचार करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, किंतु सामान्य चिकित्सा संबंधी जटिल मामलों का उपचार संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा किया जाना अपेक्षित है। इस प्रकार की कार्यप्रणाली चिकित्सा दायरे और विशेषज्ञता की सीमाओं को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है।
इस संबंध में ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी डॉ. इकबाल आरिफ शेख ने स्पष्ट किया कि संबंधित समय पर चिकित्सक इमरजेंसी वार्ड में मरीजों को देख रहे थे तथा बाद में ओपीडी के मरीजों का परीक्षण डॉक्टरों द्वारा ही किया गया।
हालांकि, प्रश्न यह है कि यदि अस्पताल में पर्याप्त चिकित्सक उपलब्ध हैं तो ओपीडी व्यवस्था नियमित और पारदर्शी क्यों नहीं है? मरीजों को सीधे चिकित्सकीय परामर्श क्यों नहीं मिल रहा? क्या राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू हो रही है?
यह मामला केवल एक स्वास्थ्य केंद्र तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य की चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त प्रशासनिक शिथिलता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। जरूरत है कि संबंधित विभाग इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए, ओपीडी प्रबंधन की पारदर्शिता सुनिश्चित करे और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे ताकि मरीजों को निर्धारित मानकों के अनुरूप उपचार मिल सके।
जनस्वास्थ्य व्यवस्था सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि जमीनी स्तर पर चिकित्सकीय सेवाएं इसी प्रकार संचालित होती रहीं, तो यह न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की साख पर आघात है, बल्कि आमजन के विश्वास को भी कमजोर करने वाला है।
जनता की अपेक्षा है कि राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करें, ताकि भविष्य में किसी भी मरीज को लापरवाही का सामना न करना पड़े।
