Written by : Sanjay kumar
होली विषेश
उदयपुर, राजस्थान: 4 मार्च 2026।
होली जहां देशभर में रंगों, गुलाल और उल्लास के साथ मनाई जाती है, वहीं मेनार गांव में यह पर्व शौर्य, इतिहास और परंपरा के अद्वितीय संगम के रूप में मनाया जाता है। यहां होली के तीसरे दिन सदियों पुरानी परंपरा के तहत तोपों की गर्जना, बंदूकों की गूंज और पारंपरिक शस्त्रों के प्रदर्शन के साथ वीरता का स्मरण किया जाता है।
उदयपुर से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित यह ऐतिहासिक गांव होली के अवसर पर विशेष रूप से जीवंत हो उठता है। रंगों की होली के साथ-साथ यहां ‘जमरा बीज’ पर आयोजित होने वाला शस्त्र उत्सव ग्रामीणों की सामूहिक एकता और पराक्रम की याद दिलाता है।
परंपरा और आयोजन की विशेषता
इस अवसर पर गांव के प्रमुख स्थल ओंकारेश्वर चबूतरे पर पारंपरिक विधि से कार्यक्रम का शुभारंभ होता है। ग्रामीण पहले सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं, तत्पश्चात पांच दलों में संगठित होकर गांव के विभिन्न मार्गों से चारभुजा मंदिर चौक तक पहुंचते हैं। नेतृत्व के संकेत पर प्रतीकात्मक हवाई फायरिंग और लघु तोपों की सलामी दी जाती है।
सभी प्रतिभागी पारंपरिक परिधान—सफेद धोती-कुर्ता और साफा—धारण करते हैं। मशालों की रोशनी, ढोल-नगाड़ों की थाप और बारूद की गूंज के बीच पूरा वातावरण वीर रस से ओत-प्रोत हो उठता है।
इतिहास से जुड़ी वीरगाथा
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा मेवाड़ के वीर शासक महाराणा अमर सिंह के समय से जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि उस कालखंड में मुगल सेना की छावनी से क्षेत्रवासी त्रस्त थे। होली के अवसर पर संगठित होकर ग्रामीणों ने रणनीतिक ढंग से आक्रमण कर छावनी को खदेड़ दिया। इसी विजय स्मृति को जीवित रखने के लिए यह परंपरा आज भी निभाई जाती है।
सुरक्षा और अनुशासन का उदाहरण
विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सदियों से निभाई जा रही इस परंपरा में आज तक किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली है। आयोजन पूर्ण सावधानी, सामूहिक अनुशासन और पारंपरिक मर्यादाओं के साथ संपन्न होता है।
राजस्थान की विविध होली परंपराएं
राजस्थान अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए प्रसिद्ध है। यहां शेखावाटी की चंग-गीदड़ नृत्य होली, जोधपुर की अनूठी परंपराएं, सांगोद (कोटा) की न्हाण होली, बीकानेर की रम्मत, जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर की फूलों की होली जैसी अनेक विशिष्ट शैलियां देखने को मिलती हैं।
मेनार की यह बारूदी होली न केवल क्षेत्र की ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि परंपराएं जब अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ निभाई जाएं, तो वे समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम बनती हैं।

