Written by : Sanjay kumar
कोटा, 12 मई।
कोटा मेडिकल कॉलेज से जुड़े नए अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते 7 दिनों में सिजेरियन डिलीवरी के बाद 4 प्रसूताओं की मौत हो चुकी है, जबकि 2 महिलाओं की हालत अब भी नाजुक बनी हुई है। कई अन्य प्रसूताएं ICU में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन मौतों का असली कारण क्या है? सात दिन बीत जाने के बावजूद चिकित्सा प्रशासन अब तक स्पष्ट जवाब देने में विफल रहा है। उल्टा पूरे मामले को दबाने और जिम्मेदारी से बचने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं।

मौतें बढ़ीं, लेकिन सच अब भी पर्दे में
सूत्रों के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं में किडनी संक्रमण और गंभीर जटिलताएं सामने आईं। इसके बावजूद अब तक न तो आधिकारिक कारण स्पष्ट किए गए और न ही जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। चार मृत प्रसूताओं में से केवल एक का पोस्टमॉर्टम कराया गया, लेकिन उसकी रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं की गई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
ICU में जिंदगी की जंग, कई महिलाओं का यूरिन आउटपुट बंद
नए अस्पताल के ICU में भर्ती 6 प्रसूताओं में से 2 की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है। कई महिलाओं का कई दिनों से यूरिन आउटपुट बंद है, जिससे किडनी फेल्योर जैसी स्थिति बन गई है।
आरती नामक प्रसूता का डायलिसिस किया गया, जबकि धन्नी बाई का अब तक तीन बार डायलिसिस हो चुका है। रागिनी की हालत में आंशिक सुधार बताया जा रहा है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
संक्रमण बढ़ा तो भर्ती बंद, वार्ड के बाहर पुलिस तैनात
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नए अस्पताल और जेके लोन में प्रसूताओं की नई भर्ती रोक दी गई है। जिन वार्डों में प्रसूताएं भर्ती हैं, वहां पुलिस तैनात कर दी गई है।
जयपुर से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम भी दोबारा कोटा पहुंची और मरीजों की स्थिति का जायजा लिया।

3 दिन की मासूम बेटी को लेकर धरने पर बैठे परिजन
प्रसूता पिंकी महावर की मौत के बाद परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए शव लेने से इनकार कर दिया और अस्पताल परिसर में धरने पर बैठ गए।
बीती रात एक और प्रसूता की मौत के बाद शहर जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष राखी गौतम भी अस्पताल पहुंचीं और पीड़ित परिवार के साथ धरने पर बैठ गईं। उन्होंने नवजात शिशु को गोद में लेकर परिजनों को सांत्वना दी और पूरे मामले की न्यायिक जांच, दोषी डॉक्टरों पर कार्रवाई तथा मृतक परिवारों को मुआवजा देने की मांग उठाई। राखी गौतम ने चेतावनी दी कि जब तक पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिलेगा, धरना जारी रहेगा। उनके साथ बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और स्थानीय लोग भी मौजूद रहे

बच्चेदानी हाथों में लेकर भटकते रहे परिजन
मामले ने तब और संवेदनशील रूप ले लिया जब मृतका पिंकी महावर की ऑपरेशन के दौरान निकाली गई बच्चेदानी को जांच के लिए परिजनों को ही सौंप दिया गया।
आरोप है कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने जांच के लिए उसे लेने तक से इनकार कर दिया। मजबूर परिजन पूरे दिन बच्चेदानी लेकर अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे। इस घटना ने चिकित्सा तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया।
जांच के नाम पर सिर्फ सैम्पल, रिपोर्ट अब तक गायब
दवाइयों के सैम्पल लिए गए हैं, लेकिन उनकी रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आई है। वहीं गायनिकी वार्ड की कल्चर रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन लगातार अलग-अलग बयान देकर जिम्मेदारी से बचता नजर आ रहा है। प्राचार्य डॉ. निलेश जैन का कहना है कि सभी प्रसूताओं के लक्षण अलग-अलग हैं, इसलिए मामलों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
मानवाधिकार आयोग ने लिया स्वतः संज्ञान
राज्य मानवाधिकार आयोग ने पूरे मामले को गंभीर मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव और चिकित्सा विभाग के निदेशक को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
आयोग अध्यक्ष जीआर मूलचंदानी ने कहा कि यदि अस्पतालों में सर्जरी के बाद लगातार मौतें हो रही हैं तो यह स्वास्थ्य के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। आयोग ने प्रदेशभर में कुशल चिकित्सकों और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।
बड़ा सवाल…
आखिर 7 दिन में 4 प्रसूताओं की मौत का जिम्मेदार कौन?
क्या यह चिकित्सा लापरवाही है, संक्रमण का मामला है या फिर सिस्टम की बड़ी विफलता?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
