विशेष : संजय कुमार
नई दिल्ली:26 जुलाई 2026
भारत का शिक्षा मंत्रालय (पूर्ववर्ती मानव संसाधन विकास मंत्रालय) बीते एक दशक से अधिक समय से देश के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील मंत्रालयों में शामिल रहा है। वर्ष 2014 से लेकर 2026 तक के 12 वर्षों के कार्यकाल में जहां रक्षा, गृह, वित्त और विदेश जैसे प्रमुख मंत्रालयों में अपेक्षाकृत राजनीतिक और प्रशासनिक निरंतरता देखने को मिली, वहीं शिक्षा मंत्रालय की कमान चार अलग-अलग केंद्रीय मंत्रियों के हाथों में रही।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के क्रियान्वयन से लेकर संस्थागत बदलावों, अकादमिक स्वायत्तता की बहसों और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की चुनौतियों तक—शिक्षा मंत्रालय हमेशा सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना रहा। इस 12 साल की अवधि में मंत्रालय के नेतृत्व, उसकी नीतियों और विवादों का एक विस्तृत लेखा-जोखा:
1. स्मृति ईरानी (2014 – 2016): आक्रामक शुरुआत, अकादमिक विवाद और नीतिगत नींव
मई 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी स्मृति ईरानी को सौंपी गई। उनके दो साल के कार्यकाल को तीव्र अकादमिक बहसों और प्रशासनिक कड़े कदमों के लिए याद किया जाता है।
- प्रमुख कार्य एवं उपलब्धियां:
- उनके कार्यकाल के दौरान ही वर्ष 1986 के बाद पहली बार एक नई और व्यापक ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP) का खाका तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
- प्राथमिक और उच्च शिक्षा में डिजिटल माध्यमों को बढ़ावा देने तथा ई-पाठन सामग्री उपलब्ध कराने के लिए ‘ई-पाठशाला’ और ‘सवायम’ (SWAYAM) जैसे शुरुआती डिजिटल इनिशिएटिव्स की नींव रखी गई।
- विवाद एवं चुनौतियां:
- शैक्षणिक योग्यता विवाद: पदभार संभालते ही उनकी शैक्षणिक डिग्री को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ी।
- केंद्रीय विश्वविद्यालयों में गतिरोध: हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्र छात्रवृत्ति और रोहित वेमुला प्रकरण तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में परिसर की राजनीति को लेकर व्यापक राष्ट्रव्यापी विवाद हुए।
- मंत्रालय में फेरबदल: जुलाई 2016 के मंत्रिमंडल विस्तार में उनसे यह पोर्टफोलियो वापस लेकर कपड़ा मंत्रालय सौंप दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि लगातार हो रहे विवादों और नई शिक्षा नीति के मसौदे में हो रही देरी के कारण यह बदलाव किया गया था।
2. प्रकाश जावड़ेकर (2016 – 2019): शांत कूटनीति, संस्थागत ग्रेडिंग और संवाद की नीति
स्मृति ईरानी के बाद जुलाई 2016 में वरिष्ठ भाजपा नेता प्रकाश जावड़ेकर को मंत्रालय का प्रभार मिला। संघ पृष्ठभूमि से आने वाले जावड़ेकर का रुख शांत और संवाद-आधारित माना जाता था।
- प्रमुख कार्य एवं उपलब्धियां:
- NIRF रैंकिंग को मजबूती: भारत के शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता मापने के लिए ‘नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क’ (NIRF) को व्यवस्थित रूप से लागू किया गया।
- एमिनेंस दर्जा (Institutions of Eminence): देश के चुने हुए सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए स्वशासी और विशेष वित्तीय दर्जा देने की योजना शुरू की गई।
- कस्तूरीरंगन समिति: पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नई शिक्षा नीति का अंतिम मसौदा तैयार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया।
- विवाद एवं चुनौतियां:
- जावड़ेकर के कार्यकाल में नीतिगत फैसलों में स्थिरता लाने का प्रयास तो हुआ, लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम परिवर्तन, इतिहास के पुनरीक्षण और वैचारिक नियुक्तियों को लेकर वामपंथी व विपक्षी हलकों से आलोचनाएं जारी रहीं। 2019 के आम चुनाव के बाद जब दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ, तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई।
3. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ (2019 – 2021): ‘शिक्षा मंत्रालय’ का पुनर्मूल्यांकन और NEP 2020 का ऐतिहासिक आगमन
2019 में मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को यह प्रभार सौंपा गया। उनका कार्यकाल ऐतिहासिक नीतिगत बदलावों और वैश्विक महामारी कोविड-19 की अभूतपूर्व चुनौतियों से भरा रहा।
- प्रमुख कार्य एवं उपलब्धियां:
- मंत्रालय का नाम परिवर्तन: 1985 में राजीव गांधी सरकार के समय बदला गया ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ का नाम पुनः बदलकर मूल नाम ‘शिक्षा मंत्रालय’ (Ministry of Education) किया गया, ताकि शिक्षा के व्यापक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020): जुलाई 2020 में केंद्रीय कैबिनेट ने 34 साल पुरानी शिक्षा नीति को बदलकर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दी, जिसमें 5+3+3+4 स्कूली संरचना और बहु-विषयक उच्च शिक्षा पर जोर दिया गया।
- कोविड काल में ऑनलाइन शिक्षा: महामारी के दौरान ‘मनोदर्पण’ पहल और ‘पीएम ई-विद्या’ के तहत टीवी चैनलों और इंटरनेट के माध्यम से डिजिटल शिक्षा को निरंतर बनाए रखने का प्रयास किया गया।
- विवाद एवं चुनौतियां:
- क्षेत्रीय असंतोष और सुरक्षात्मक मुद्दे: कतिपय क्षेत्रों में छात्रों की सुरक्षा, कश्मीरी विद्यार्थियों से जुड़े विवाद और परीक्षा तिथियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही।
- इस्तीफा: जुलाई 2021 के बड़े केंद्रीय मंत्रिमंडल फेरबदल के दौरान स्वास्थ्य संबंधी कारणों (कोविड-19 के बाद की जटिलताओं) का हवाला देते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
4. धर्मेंद्र प्रधान (2021 – 2026): NEP का क्रियान्वयन, भाषा विवाद और परीक्षा प्रणाली पर गतिरोध
जुलाई 2021 में धर्मेंद्र प्रधान को देश का शिक्षा मंत्री बनाया गया। पेट्रोलियम मंत्रालय में लंबे और सफल कार्यकाल के बाद उन्हें शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को संभालने का जिम्मा मिला, जिस पर वे 2024 की मोदी 3.0 सरकार में भी बने रहे।
- प्रमुख कार्य एवं उपलब्धियां:
- NEP 2020 का जमीनी कार्यान्वयन: भारतीय भाषाओं में प्राथमिक व उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने, मातृभाषा में पाठ्यपुस्तकें तैयार करने और कौशल विकास (Skill Development) को स्कूली शिक्षा से जोड़ने पर अभूतपूर्व बल दिया गया।
- भारतीय भाषा उत्सव: शिक्षा में बहुभाषी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर अभियानों का संचालन किया गया।
- विवाद एवं चुनौतियां:
- त्रि-भाषा फॉर्मूला और केंद्र-राज्य टकराव: तमिलनाडु सहित कुछ गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ भाषाओं की नीति को लेकर सीधा टकराव देखने को मिला, जहां केंद्र सरकार पर भाषाई थोपने के आरोप लगाए गए।
- प्रतियोगी परीक्षाओं पर संकट: उनके कार्यकाल के अंतिम चरण में नीट (NEET) और अन्य राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं में धांधली व पेपर लीक के आरोपों ने उग्र रूप धारण कर लिया।
- छात्र आंदोलन और राजनीतिक घटनाक्रम: परीक्षाओं की पारदर्शिता और प्रणालीगत सुधारों की मांग को लेकर राजधानी के जंतर-मंतर से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन देशव्यापी रूप ले गया। यद्यपि सरकार शुरू में संस्थागत सुधारों और बातचीत के जरिए समाधान का प्रयास कर रही थी, लेकिन प्रशासनिक और जन-दबाव के बीच आखिरकार हाल ही में शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
वैचारिक दिशा, ढांचागत सुधार और सॉफ्ट पावर का संतुलन
शिक्षा मंत्रालय के इस 12 साल के घटनाक्रम का सूक्ष्म अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत में शिक्षा का क्षेत्र केवल प्रशासनिक नीतियों तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों और नीतिगत विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षा, संस्कृति और सूचना एवं प्रसारण जैसे विभाग किसी भी देश की ‘सॉफ्ट पावर’ और वैचारिक दृष्टि को आकार देने वाले माध्यम होते हैं।
- स्वतंत्र विज़न बनाम नीतिगत निरंतरता: 2014 के बाद से लागू की गई नीतियां एक व्यापक और दीर्घकालिक रणनीतिक विज़न का हिस्सा रही हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता के बाद से चली आ रही औपनिवेशिक व पारंपरिक सोच को बदलकर भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा तंत्र का निर्माण करना रहा है।
- कार्यान्वयन की विभिन्न शैलियां: चारों शिक्षा मंत्रियों के कार्य करने का तरीका अलग रहा। जहां प्रारंभिक दौर में मुखर और कड़े फैसलों पर जोर दिया गया, वहीं बाद के दौर में शांत रणनीतिक फैसलों और अंततः व्यापक प्रशासनिक सुधारों को प्राथमिकता दी गई।
निष्कर्ष:
2014 से 2026 तक के 12 वर्षों का यह दौर भारतीय शिक्षा इतिहास में बड़े नीतिगत प्रयोगों, वैचारिक रूपांतरण और अभूतपूर्व छात्र-केंद्रित बहसों के लिए जाना जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जैसा बड़ा ढांचागत ढांचा तैयार होने के बावजूद, परीक्षाओं की पारदर्शिता और केंद्र-राज्य समन्वय जैसे मुद्दे आज भी एक ऐसी चुनौती बने हुए हैं, जिनका पारदर्शी समाधान तलाशना आने वाले नेतृत्व के लिए सबसे प्राथमिक कार्य होगा।
