Written by : Sanjay kumar
नई दिल्ली | 30 जुलाई 2026
शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी UDISE+ (2025-26) के नवीनतम आंकड़ों ने देश भर में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की जमीनी हकीकत पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1,00,843 (1 लाख से अधिक) सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूल ऐसे हैं, जो महज एक ही शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
हालाँकि, यह आंकड़ा पिछले वर्षों (1,04,125) की तुलना में थोड़ा घटा है, लेकिन देश में इतने बड़े पैमाने पर एकल-शिक्षक (Single-Teacher) स्कूलों की उपस्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।
आंध्र प्रदेश सूची में शीर्ष पर, देश के 16% से अधिक एकल-शिक्षक स्कूल अकेले यहाँ
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि देश में अकेले आंध्र प्रदेश इस सूची में पहले स्थान पर है, जहाँ 16,357 स्कूल केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं—जो कि कुल राष्ट्रीय आंकड़ों के 16% से भी अधिक है।
सर्वाधिक प्रभावित शीर्ष राज्य:
- आंध्र प्रदेश: 16,357 स्कूल
- झारखंड: 9,827 स्कूल
- महाराष्ट्र: 9,269 स्कूल
- कर्नाटक: 8,042 स्कूल
- उत्तर प्रदेश: 7,874 स्कूल
- राजस्थान: 7,200 स्कूल
इसके अलावा, तेलंगाना (4,793), तमिलनाडु (3,957), असम (3,159), हिमाचल प्रदेश (3,128), उत्तराखंड (2,655) और छत्तीसगढ़ (2,461) जैसे राज्यों में भी स्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं।
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेश
इसके विपरीत, देश के कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस दिशा में सराहनीय प्रदर्शन किया है:
- अंडमान-निकोबार: केवल 1 स्कूल
- दिल्ली: 7 स्कूल
- लद्दाख: 28 स्कूल
- सिक्किम: 31 स्कूल
- नागालैंड: 35 स्कूल
- केरल: 67 स्कूल
राष्ट्रीय औसत बनाम धरातल की विषमता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुसार, देश में औसत छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) मानकों के अनुकूल है:
- प्राइमरी स्तर: 19 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक
- अपर प्राइमरी स्तर: 17 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक
- सेकेंडरी स्तर: 15 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक
- हायर सेकेंडरी स्तर: 23 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक
चुनौती कहाँ है?
राष्ट्रीय औसत बेहतर होने के बावजूद, ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में शिक्षकों की असमान तैनाती के कारण एक अकेला शिक्षक पढ़ाई कराने के साथ-साथ मिड-डे मील की देखरेख, दाखिला प्रक्रिया और रोजाना के प्रशासनिक कार्यों का बोझ उठाने पर मजबूर है।
केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण और कदम
संसद में जानकारी देते हुए शिक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों की भर्ती, सेवा शर्तें और उनकी तैनाती पूरी तरह से राज्य सरकारों एवं केंद्र शासित प्रदेशों का विषय है। पदों के खाली रहने के मुख्य कारण:
- शिक्षकों की सेवानिवृत्ति (Retirement) एवं इस्तीफे।
- नए पदों का सृजन और पुनर्गठन।
- ग्रामीण, आदिवासी और आकांक्षी जिलों में नामांकन की बदलती स्थिति।
केंद्र सरकार के अनुसार, राज्यों को पारदर्शी और योग्यता-आधारित प्रक्रिया के ज़रिए रिक्त पदों को भरने की नियमित सलाह दी जाती है। साथ ही, ‘समग्र शिक्षा’ योजना के तहत राज्यों को आवश्यक वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
