Written by : Sanjay kumar
नई दिल्ली: 26 अगस्त 2026
भारतीय राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर से बेहद आक्रामक रूप से सड़कों पर उतर आया है। सोशल मीडिया की आभासी बहसों से निकलकर यह विरोध अब सीधे राजधानी दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देने लगा है। शुक्रवार को देश के अलग-अलग कोनों से आए सामान्य वर्ग और विभिन्न संगठनों के लोग दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र हुए और मौजूदा आरक्षण प्रणाली के खिलाफ जोरदार हुंकार भरी। हालांकि दिल्ली प्रशासन ने इस प्रदर्शन की कोई आधिकारिक अनुमति नहीं दी थी और इलाके में निषेधाज्ञा लागू थी, फिर भी हजारों की संख्या में पहुंचे प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया कि जाति आधारित व्यवस्था को लेकर युवाओं के भीतर किस कदर असंतोष और घुटन भरी हुई है। शाम होते-होते पुलिस और सुरक्षा बलों ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रदर्शनकारियों को ज़बरदस्ती वहां से हटाया, जिससे यह साफ हो गया कि व्यवस्था इस संवेदनशील मुद्दे पर कितनी सतर्क है। यहां तक की इस आंदोलन को, इस प्रदर्शन को, सामान्य वर्ग की इस मांग को मीडिया तक में नहीं आने दिया गया।


आरक्षण की नींव और उसका इतिहास: क्या था इस व्यवस्था को लाने का मूल उद्देश्य?
भारतीय संविधान में आरक्षण व्यवस्था को शामिल करने के पीछे एक बहुत ही गहरा, ऐतिहासिक और सामाजिक उद्देश्य था। सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता, छुआछूत और जातिगत भेदभाव के कारण समाज के एक बड़े वर्ग को शिक्षा, सम्मान और बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। संविधान निर्माताओं और देश के मनीषियों का मुख्य लक्ष्य यही था कि इन पिछड़े और शोषित समुदायों को समाज की मुख्यधारा में लाकर खड़ा किया जाए। शुरुआत में इस व्यवस्था को एक सीमित समय सीमा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के दायरे में परिकल्पित किया गया था ताकि ऐतिहासिक रूप से पिछड़े तबकों को शुरुआती मजबूती मिल सके, जिससे वे देश के विकास में बराबरी से अपनी हिस्सेदारी निभा सकें।
क्या आरक्षण ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है और क्या इसकी समय अवधि अब समाप्त हो चुकी है?
आज देश के युवाओं के मन में सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यही उठ रहा है कि क्या जिस उद्देश्य के लिए आरक्षण लाया गया था, वह अब पूरा हो चुका है? दशकों का लंबा समय बीत जाने के बाद भी जब यह व्यवस्था अनवरत जारी है, तो सामान्य वर्ग के युवाओं के भीतर यह रोष पनपने लगा है कि क्या यह अब केवल राजनीतिक लाभ का जरिया बनकर रह गई है। आंदोलन से जुड़े लोगों का तर्क है कि जब आरक्षित वर्ग के लोग देश के सर्वोच्च पदों जैसे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और सांसदों-विधायकों की कुर्सियों पर सुशोभित हो रहे हैं, तो यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे सामाजिक रूप से सशक्त हो चुके हैं। ऐसे में, इस सुविधा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही दायरे में कैद रखना कहाँ तक न्यायसंगत है?
क्या वाकई गरीबी और जाति के नाम पर समाज में बहुत बड़ा भेदभाव पैदा हो रहा है?
इस पूरे आंदोलन की सुलगती आग के केंद्र में यह कड़वी हक़ीक़त है कि वर्तमान आरक्षण प्रणाली के कारण समाज में दूरियां मिटने के बजाय और अधिक गहरी हो रही हैं। हरियाणा के पलवल से इस आंदोलन में हिस्सा लेने आए कुलदीप कौशिक जैसे युवाओं का दर्द यह बयां करता है कि कैसे यह व्यवस्था आम और जरूरतमंद युवाओं के साथ भयंकर अन्याय कर रही है। जो परिवार पीढ़ियों से संपन्न हैं, जिनके माता-पिता बड़े पदों पर आसीन हैं, उनके बच्चों को भी जब केवल जाति के आधार पर आरक्षण का मलाईदार लाभ मिलता है, तो सामान्य वर्ग के गरीब और मेधावी युवाओं के लिए तरक्की के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। यही कारण है कि युवाओं के मन में यह भावना घर कर रही है कि यह व्यवस्था अब योग्यता और ‘मेरिट’ का गला घोंट रही है।

प्रदर्शनकारियों की वास्तविक मांगें: क्या वे पूरी तरह आरक्षण खत्म करना चाहते हैं?
यद्यपि इस अभियान का आक्रामक नाम ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ है, लेकिन ज़मीन पर उतरे अधिकांश प्रदर्शनकारियों और विचारकों का मंतव्य इसे पूरी तरह नेस्तनाबूद करना नहीं, बल्कि इसमें क्रांतिकारी और न्यायसंगत सुधार लाना है। सनातन सेवा परिषद के अध्यक्ष तेजस शांडिल्य और अन्य आंदोलनकारियों का मुख्य तर्क है कि चयन का एकमात्र आधार जाति न होकर केवल ‘आर्थिक स्थिति’ और ‘योग्यता’ होनी चाहिए। उनकी प्रमुख मांगों में आरक्षण व्यवस्था की नए सिरे से गहन समीक्षा करना, मलाईदार तबके को बाहर करने के लिए ‘क्रीमी लेयर’ के नियमों को कड़ाई से लागू करना, और उच्च शिक्षा व यूजीसी के नियमों में बदलाव कर सभी के लिए एक समान कट-ऑफ सुनिश्चित करना शामिल है। इसके साथ ही, वे सरकार से पारदर्शी आंकड़ों के साथ एक श्वेतपत्र जारी करने की भी मांग कर रहे हैं।
लखनऊ की प्रेस वार्ता और आंदोलन के भीतर खड़े हुए गहरे मतभेद
इस आंदोलन की तपिश दिल्ली से निकलकर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक जा पहुंची, जहां इसके अगले ही दिन एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। आंदोलन के एक प्रमुख आयोजक हर्ष दुबे ने यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ लखनऊ में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उपमुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि छात्रों के प्रतिनिधिमंडल की मांगों को व्यवस्थित रूप से केंद्र सरकार के समक्ष रखा जाएगा और दो दिन के भीतर केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात कराई जाएगी। हालांकि, इस एक कदम ने आंदोलन के भीतर ही भारी कलह और फूट पैदा कर दी। अनुराधा तिवारी और अन्य कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से हर्ष दुबे और सरकार के बीच हुई इस बातचीत से पूरी तरह किनारा कर लिया। आलोचकों और अन्य सहयोगियों ने तंज कसते हुए इसे आंदोलन को कमजोर करने और अपनी रोटियां सेकने का प्रयास करार दिया, जिससे यह साबित होता है कि वैचारिक एकता के बाद भी इस मुहिम के नेतृत्व को लेकर अंतर्विरोध गहराने लगे हैं।
भाजपा और केंद्र सरकार का रुख: अमित शाह के बयान और आधिकारिक नीतियां
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक दलों और विशेषकर सत्तारूढ़ दल का रुख बेहद स्पष्ट रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विभिन्न मंचों और बयानों में बार-बार यह स्पष्ट किया है कि भारतीय जनता पार्टी की आधिकारिक नीति आरक्षण को समाप्त करने की कभी नहीं रही है। गृह मंत्री ने दो टूक शब्दों में यह कहा है कि जब तक भाजपा राजनीति में है, तब तक दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों का आरक्षण कोई खत्म नहीं कर सकता और न ही पार्टी इसे कभी हाथ लगाएगी। केंद्र सरकार एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को पूरी मजबूती के साथ बनाए रखने की पक्षधर है और उसका मुख्य ज़ोर आरक्षित पदों की खाली रिक्तियों को तेजी से भरने पर है। हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी आरक्षण के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने के विचार का कड़ा विरोध भी किया है, क्योंकि सरकार का आधिकारिक तर्क है कि एससी/एसटी आरक्षण का मुख्य आधार आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि सदियों का ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव है। इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा प्रदर्शनकारियों से की गई बातचीत ने इस राजनीतिक हलचल को और अधिक तेज जरूर कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार इस वर्ग के असंतोष को लेकर भी पूरी तरह सतर्क और गंभीर नजर आ रही है।(बीबीसी न्यूज़ इनपुट के हवाले से जानकारी)
