Health Insurance Scam? जीएसटी हटते ही महंगा हुआ स्वास्थ्य बीमा, राहत के नाम पर बीमा कंपनियों ने किया खुला खेल

Written by : Sanjay kumar


सरकार की मंशा पर फिरा पानी, उपभोक्ता ठगा हुआ महसूस कर रहे

जयपुर, 02 जनवरी 2026।
केंद्र सरकार द्वारा 22 सितंबर को पर्सनल लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर जीएसटी को शून्य किए जाने के फैसले को आम नागरिकों के लिए बड़ी राहत के रूप में प्रचारित किया गया था। सरकार की मंशा थी कि स्वास्थ्य बीमा सस्ता होगा, कवरेज बढ़ेगा और मध्यम व निम्न आय वर्ग को सीधा लाभ मिलेगा।

लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट सामने आई है। राजस्थान सहित कई राज्यों में बीमा कंपनियों ने जीएसटी हटने के तुरंत बाद अपने बेस प्रीमियम में 8 से 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी। नतीजतन, उपभोक्ताओं को राहत मिलने के बजाय पहले से अधिक प्रीमियम चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।


जीएसटी हटाया गया, लेकिन जेब और ज्यादा ढीली हो गई

जीएसटी रिफॉर्म के बाद आम नागरिकों को उम्मीद थी कि सालाना प्रीमियम में सीधी कटौती होगी, लेकिन कंपनियों ने जीएसटी हटने का फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के बजाय अपने मुनाफे को सुरक्षित करने का रास्ता चुन लिया।

विशेषज्ञों के अनुसार, पहले बीमा कंपनियां विभिन्न सेवाओं पर चुकाए गए जीएसटी को प्रीमियम पर लगने वाले जीएसटी से समायोजित कर लेती थीं। जीएसटी शून्य होने के बाद इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का यह रास्ता बंद हुआ, और इसी कथित घाटे की भरपाई के लिए प्रीमियम बढ़ाकर बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया गया


1800 की राहत, सिर्फ 800 में सिमटी

एक उपभोक्ता पिछले 10 वर्षों से निजी स्वास्थ्य बीमा करा रहा है।

  • पिछले वर्ष उसका बेस प्रीमियम: 10,000 रुपए
  • उस पर 18% जीएसटी: 1,800 रुपए
  • कुल भुगतान: 11,800 रुपए

इस वर्ष जीएसटी हटाया गया, लेकिन कंपनी ने बेस प्रीमियम बढ़ाकर 11,000 रुपए कर दिया।
इस तरह उपभोक्ता को 1,800 रुपए की जगह सिर्फ 800 रुपए का ही लाभ मिला।
यानी सरकार ने जो राहत दी, उसका बड़ा हिस्सा कंपनी ने खुद रख लिया।


जहां कम होना था, वहां और बढ़ गया प्रीमियम

कई उपभोक्ताओं के मामलों में स्थिति और भी गंभीर है।
एक परिवार का पिछले वर्ष का सालाना प्रीमियम 34,120 रुपए था।
जीएसटी हटने के बाद उम्मीद थी कि प्रीमियम घटकर लगभग 28,000 रुपए रह जाएगा।

लेकिन इस वर्ष उन्हें 35,819 रुपए का प्रीमियम नोटिस थमा दिया गया।
कंपनी से पूछने पर जवाब मिला— “पॉलिसी रेट बढ़ गए हैं।”


आईटीसी का बहाना, उपभोक्ताओं से वसूली

बीमा कंपनियों का तर्क है कि जीएसटी हटने से उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिल रहा, जिससे उनकी लागत बढ़ गई है।
लेकिन सवाल यह है कि—

  • क्या सरकारी राहत का बोझ आम नागरिक पर डालना न्यायसंगत है?
  • क्या कंपनियों को मनमर्जी से बेस प्रीमियम बढ़ाने की खुली छूट है?
  • क्या यह अप्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं के साथ धोखा नहीं है?

सरकार और रेगुलेटर की चुप्पी पर सवाल

स्वास्थ्य बीमा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
आईआरडीएआई (IRDAI) और संबंधित मंत्रालय की ओर से अब तक कोई स्पष्ट गाइडलाइन, निगरानी या सख्त कार्रवाई सामने नहीं आई है।

अगर बीमा कंपनियां जीएसटी हटने के बाद भी मनमाने तरीके से प्रीमियम बढ़ाती रहेंगी, तो—

  • आम नागरिक का बीमा व्यवस्था से भरोसा टूटेगा
  • स्वास्थ्य बीमा फिर से अमीरों तक सीमित रह जाएगा
  • सरकार की “सभी के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा” की नीति कमजोर पड़ेगी

आम नागरिक ठगा और मायूस

आज स्थिति यह है कि आम नागरिक यह महसूस कर रहा है कि—

  • सरकार ने राहत की घोषणा की
  • बीमा कंपनियों ने उसका फायदा खुद उठा लिया
  • और उपभोक्ता पहले से ज्यादा भुगतान करने को मजबूर हो गया

स्वास्थ्य बीमा, जो सुरक्षा का माध्यम होना चाहिए था, अब लूट और मुनाफाखोरी का जरिया बनता दिख रहा है


मांग

  • बीमा कंपनियों द्वारा जीएसटी हटने के बाद की गई प्रीमियम वृद्धि की स्वतंत्र जांच हो
  • आईआरडीएआई स्पष्ट निर्देश जारी करे कि जीएसटी लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचे
  • मनमानी बढ़ोतरी करने वाली कंपनियों पर जुर्माना और कार्रवाई हो
  • पारदर्शी प्रीमियम निर्धारण प्रणाली लागू की जाए

जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक यह आशंका बनी रहेगी कि स्वास्थ्य बीमा सुधार आम जनता के लिए नहीं, बल्कि कंपनियों के मुनाफे के लिए किया गया है।


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