Written by : Sanjay kumar
नई दिल्ली, 27 जनवरी|
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए नए नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक व्यापक असंतोष और विरोध देखने को मिल रहा है। विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में लागू इन नियमों को लेकर छात्र, शिक्षक, सामाजिक संगठन, बुद्धिजीवी और विभिन्न वर्गों के लोग सड़कों पर उतर आए हैं।
यह उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोहित वेमुला प्रकरण की सुनवाई के दौरान उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाए जाने के निर्देश दिए गए थे। इसी क्रम में UGC ने अपने अधिनियम में संशोधन करते हुए सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में “समता समिति” का गठन अनिवार्य कर दिया है। इस समिति में SC, ST और OBC वर्ग का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है, जबकि सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। इसके अतिरिक्त, नए नियमों में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है, जो पहले मौजूद था।
इन्हीं बिंदुओं को लेकर सवर्ण समुदायों, छात्र संगठनों और सामाजिक वर्गों में गहरी नाराजगी व्याप्त है। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि भेदभाव यदि किसी भी वर्ग के साथ हो, तो उस पर समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। केवल जाति विशेष को पीड़ित और जाति विशेष को अत्याचारी मानने की मानसिकता सामाजिक समरसता के लिए घातक है। साथ ही “सुदामा कोटा”, “भिखारी” जैसे अपमानजनक संबोधनों और जातिगत टिप्पणियों पर भी कड़ी कार्रवाई की मांग उठाई जा रही है।
इस मुद्दे पर देश के प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास भी खुलकर सामने आए हैं और उन्होंने नए नियमों पर पुनर्विचार की आवश्यकता जताई है। वहीं, बरेली के नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने सरकारी नीतियों, विशेषकर UGC के नए नियमों से असहमति जताते हुए अपने पद से इस्तीफा देकर मामले को और गंभीर बना दिया है।
राजनीतिक स्तर पर भी हलचल तेज है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार भेदभावपूर्ण कानून लाएगी तो इसका विरोध सड़क से सदन तक किया जाएगा। वहीं कांग्रेस नेता हरीश रावत ने UCC और केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सरकार के पास बेरोजगारी, पलायन और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर कोई ठोस जवाब नहीं है।
उत्तर प्रदेश के रायबरेली में विरोध का एक अनोखा रूप देखने को मिला, जहां भाजपा किसान नेता रमेश सिंह, गौ रक्षा दल अध्यक्ष महेंद्र पांडे और सामाजिक कार्यकर्ता राहुल मिश्रा के नेतृत्व में चुप्पी साधने वाले नेताओं को चूड़ियां भेजने का अभियान शुरू किया गया। उनका कहना है कि जो नेता छात्र हितों और सामाजिक संतुलन के मुद्दे पर मौन हैं, उन्हें सार्वजनिक जीवन में रहने का नैतिक अधिकार नहीं है।
इस बीच UGC के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर भारत के मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष शीघ्र सुनवाई की मांग की जा रही है। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता द्वारा जल्द सुनवाई के लिए आग्रह किया जाएगा।
देश की राजधानी दिल्ली में UGC मुख्यालय के बाहर सवर्ण समुदायों के छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया, वहीं उत्तर प्रदेश के कई जिलों में लगातार धरना-प्रदर्शन और आक्रोश सभाएं आयोजित हो रही हैं।
प्रदर्शनकारियों और संगठनों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं—
- भेदभाव किसी भी जाति या वर्ग के साथ हो, उस पर समान और निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
- समता समितियों में सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया जाए।
- झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर सख्त दंड का स्पष्ट प्रावधान पुनः जोड़ा जाए।
- सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी नियम में तत्काल संशोधन किया जाए।
प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और UGC से मांग की है कि नियमों को बिना पक्षपात, संतुलन और न्याय के सिद्धांत पर पुनः संशोधित किया जाए, ताकि उच्च शिक्षा संस्थान संघर्ष का नहीं, बल्कि समानता और सम्मान का केंद्र बन सकें।
