Warren by : Sanjay kumar
राजस्थान की नदियों को मिली न्यायिक ढाल
जयपुर, 28 जनवरी।
राजस्थान में नदियों में हो रहे अंधाधुंध बजरी खनन पर रोक लगाने की दिशा में राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में किसी भी नदी क्षेत्र से बजरी खनन की अनुमति तभी दी जा सकेगी, जब उससे पहले रिप्लेनिशमेंट स्टडी (रेत की प्राकृतिक भरपाई का वैज्ञानिक अध्ययन) अनिवार्य रूप से कराई जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस प्रकार जंगलों के संरक्षण के लिए पेड़ों की कटाई से पहले उनकी वृद्धि दर का आकलन किया जाता है, उसी तरह नदियों के अस्तित्व और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए यह जानना जरूरी है कि नदी में रेत कितनी और किस गति से दोबारा जमा हो रही है। कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि निर्माण कार्यों के लिए रेत आवश्यक संसाधन है, इसलिए इस पर पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं है, लेकिन अनियंत्रित दोहन किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा।
नीलामी होगी सुप्रीम कोर्ट की CEC रिपोर्ट के अनुरूप
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिए हैं कि अब बजरी खनन से जुड़ी सभी नीलामियां सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की रिपोर्ट के अनुरूप ही की जाएंगी। इसके तहत प्रत्येक लीज क्षेत्र को पाँच वार्षिक ब्लॉकों में विभाजित करना होगा।
- एक वर्ष में केवल एक ब्लॉक से ही खनन की अनुमति होगी।
- शेष चार ब्लॉक अगले चार वर्षों तक खाली रखे जाएंगे, ताकि प्राकृतिक रूप से बजरी का पुनर्भरण हो सके।
यह नियम 100 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले छोटे प्लॉट्स पर भी समान रूप से लागू होगा।
वरिष्ठ अधिकारियों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने खनन विभाग के चार वरिष्ठ अधिकारियों—अतिरिक्त निदेशक महेश माथुर, अविनाश कुलदीप, आलोक जैन और अधीक्षण खनन अभियंता एन.एस. शक्तावत—के खिलाफ कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारियों ने जानबूझकर भ्रामक रिपोर्ट प्रस्तुत कर 100 हेक्टेयर से कम के भूखंडों को नियमों से बाहर रखने की कोशिश की।
कोर्ट ने भीलवाड़ा जिले की 46 बजरी लीजों को रद्द करते हुए सभी ठेकेदारों को जमा की गई राशि बिना ब्याज लौटाने के आदेश दिए हैं। साथ ही, राज्य सरकार को अगले चार महीनों में नया वैज्ञानिक और पर्यावरण-सम्मत खनन प्लान प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। तब तक इन क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
अदालत की दो टूक: पर्यावरण से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं
हाईकोर्ट ने तल्ख शब्दों में कहा कि राज्य सरकार और खनन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक उड़ाया है। अधिकारियों का यह अड़ियल रवैया न केवल न्यायालय की अवमानना है, बल्कि नदियों के अस्तित्व को समाप्त करने की खुली कोशिश भी है।
यह फैसला न सिर्फ राजस्थान की नदियों के संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है, बल्कि देशभर में पर्यावरण-संवेदनशील खनन नीति के लिए एक सख्त और स्पष्ट संदेश भी देता है।
