“बच्चों की सुरक्षा से समझौता नहीं”: जर्जर स्कूल भवनों पर राजस्थान हाईकोर्ट का सख्त रुख

Written by : Sanjay kumar

1 जुलाई से असुरक्षित स्कूल बंद करने के संकेत

जयपुर, 6 मार्च 2026।
Rajasthan High Court ने प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि स्कूल भवनों की स्थिति सुरक्षित नहीं पाई गई तो 1 जुलाई से ऐसे स्कूलों के संचालन पर रोक लगाई जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा मामला किसी भी प्रशासनिक बहाने या बजट की कमी के कारण टाला नहीं जा सकता।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Mahendra Kumar Goyal और न्यायमूर्ति Ashok Kumar Jain की खंडपीठ ने प्रदेश में लगातार सामने आ रहे स्कूल भवन हादसों और जर्जर भवनों की स्थिति पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे स्कूल भवनों के निर्माण, मरम्मत और सुरक्षा को लेकर तैयार की गई विस्तृत कार्ययोजना शपथ पत्र के रूप में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।

बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि, लापरवाही बर्दाश्त नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि स्कूल भवनों की खराब स्थिति बच्चों की जान को जोखिम में डाल रही है। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि जिन सरकारी और निजी विद्यालयों के भवन संरचनात्मक रूप से सुरक्षित नहीं हैं, उन्हें जुलाई से संचालित करने की अनुमति क्यों दी जाए। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि सभी स्कूल भवनों की तकनीकी जांच के लिए चार्टर्ड इंजीनियर नियुक्त किए जाएं और केवल उन्हीं संस्थानों को संचालन की अनुमति दी जाए जिन्हें इंजीनियर द्वारा सुरक्षित घोषित किया गया हो।

छोटे बच्चों के लिए विशेष निर्देश

खंडपीठ ने विशेष रूप से प्री-प्राइमरी और छोटे बच्चों की कक्षाओं को लेकर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि छोटे बच्चों को न तो बेसमेंट में पढ़ाया जाना चाहिए और न ही ऊपरी मंजिलों पर। ऐसे विद्यार्थियों की कक्षाएं केवल भूतल पर संचालित होना ही सुरक्षित और व्यावहारिक है।

निर्माण कार्य में सुस्ती पर अदालत की नाराजगी

सुनवाई के दौरान सामने आया कि प्रदेश में लगभग 3700 स्कूलों के लिए नए भवन प्रस्तावित किए गए थे, जिनमें से केवल 114 को ही प्रशासनिक स्वीकृति मिल सकी है। इन स्वीकृत परियोजनाओं में भी प्रगति अत्यंत धीमी है और अब तक केवल कुछ भवन ही प्रारंभिक निर्माण स्तर तक पहुंच पाए हैं। अदालत ने इस स्थिति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वित्तीय वर्ष समाप्ति के करीब होने के बावजूद अभी तक कई मामलों में टेंडर प्रक्रिया ही चल रही है, जो प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है।

बजट का बहाना स्वीकार नहीं

राज्य सरकार की ओर से बजट संबंधी मुद्दे उठाए जाने पर अदालत ने साफ कहा कि अदालत के आदेशों की पालना सरकार की जिम्मेदारी है और धन की कमी को बच्चों की सुरक्षा के मामलों में बहाने के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि राज्य सरकार को अतिरिक्त बजट की आवश्यकता है तो उसकी स्पष्ट जानकारी और प्रस्ताव केंद्र सरकार को क्यों नहीं भेजे गए।

प्रवासी सहयोग योजना पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि राज्य सरकार ने स्कूल भवनों के निर्माण और मरम्मत के लिए प्रवासी भारतीयों और सामाजिक संगठनों से सहयोग का आह्वान किया है। इस पहल के तहत अब तक लगभग 11 करोड़ रुपये का सहयोग प्राप्त हुआ है, लेकिन अदालत ने संकेत दिया कि इतनी बड़ी आवश्यकता के सामने यह राशि पर्याप्त नहीं है और सरकार को ठोस और समयबद्ध योजना बनानी होगी।

स्कूल हादसों पर अदालत की चिंता

पिछले कुछ समय में प्रदेश के विभिन्न जिलों में स्कूल भवनों के हिस्से गिरने और दुर्घटनाओं की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की आधारभूत संरचना पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन्हीं घटनाओं को देखते हुए अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए याचिका दर्ज की थी और अब इस मामले में नियमित सुनवाई करते हुए प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में कड़े कदम उठा रही है।

राज्य सरकार से जवाब तलब

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि तय समय में प्रभावी योजना प्रस्तुत नहीं की गई और जर्जर स्कूल भवनों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो न्यायालय बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कठोर आदेश पारित करने से भी पीछे नहीं हटेगा।

इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य सरकार से विस्तृत कार्ययोजना, बजट व्यवस्था और स्कूल भवनों की सुरक्षा जांच से संबंधित ठोस प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!