Written by : Sanjay kumar
2 महीनों में तबादलों की बाढ़, आंकड़े भी हुए हैरान
जयपुर, 22 मार्च। राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों स्थिरता से ज्यादा ‘स्पीड’ के लिए जानी जा रही है। महज दो महीनों के भीतर करीब 950 से अधिक आईएएस, आईपीएस और आरएएस अधिकारियों के तबादले कर दिए गए। यह केवल एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक ऐसा सिलसिला बन गया है, जिसने शासन की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। आदेशों की रफ्तार इतनी तेज है कि मानो फाइलों से ज्यादा ट्रांसफर लिस्ट ही काम कर रही हो।
कुर्सी पर बैठने से पहले ही ‘रिलीव’—अफसर बने घूमंतु यात्री
स्थिति अब हास्य और विडंबना का मिश्रण बन चुकी है। कई अधिकारी नए पद पर पहुंचने की तैयारी ही कर रहे होते हैं कि दूसरा आदेश आ जाता है। कुछ तो ऐसे भी उदाहरण सामने आए, जहां ज्वाइनिंग से पहले ही तबादला हो गया। अफसरशाही में अब यह कहावत चल पड़ी है—“पोस्टिंग नहीं, ट्रांजिट में हैं!” बैग खोलने का समय नहीं, क्योंकि अगला आदेश कब आ जाए, कोई भरोसा नहीं।
एक ही अफसर, एक ही जिले में बार-बार ‘री-शफल’
तबादलों की इस लहर में कई अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्हें एक ही जिले या विभाग में बार-बार इधर-उधर किया गया। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि फैसले किसी दीर्घकालिक रणनीति के तहत नहीं, बल्कि तत्कालिक प्रयोग के आधार पर लिए जा रहे हैं। सवाल उठता है—क्या यह प्रशासनिक सुधार है या फिर ‘देखते हैं, क्या होता है’ वाला प्रयोग?
फाइलें ठंडी, कुर्सियां गर्म—जनता बीच में परेशान
बार-बार के तबादलों का सबसे बड़ा असर आमजन पर पड़ रहा है। जो अधिकारी किसी योजना को समझते-समझते आगे बढ़ते हैं, उनका स्थानांतरण होते ही पूरी प्रक्रिया फिर से शून्य पर आ जाती है। जनता को हर बार नए अधिकारी के सामने अपनी समस्या दोहरानी पड़ती है। विकास कार्यों की गति धीमी हो जाती है और योजनाएं कागजों में ही घूमती रहती हैं।
अनुभव बनाम निर्णय: असली ड्राइविंग सीट किसके पास?
सरकार में मंत्री नीतिगत निर्णय लेते हैं, लेकिन उन्हें ज़मीन पर लागू करने का काम अनुभवी अफसरों के हाथ में होता है। जब यही अफसर लगातार अस्थिरता का सामना करेंगे, तो नीतियों का प्रभाव भी कमजोर पड़ना तय है। यह स्थिति कुछ ऐसी हो गई है जैसे अनुभवी ड्राइवर को हर थोड़ी दूरी पर बदल दिया जाए और उम्मीद की जाए कि गाड़ी बिना झटकों के मंजिल तक पहुंचे।
‘ट्रांसफर उद्योग’ की चर्चा, सुशासन पीछे छूटा?
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि राजस्थान में इन दिनों ‘ट्रांसफर’ ही सबसे सक्रिय विभाग बन गया है। सुशासन, पारदर्शिता और स्थिरता जैसे शब्द पीछे छूटते नजर आ रहे हैं, जबकि तबादलों की सूचियां लगातार लंबी होती जा रही हैं।
अफसरशाही में असमंजस, फैसलों में हिचकिचाहट
जब किसी अधिकारी को यह भरोसा नहीं हो कि वह अपने पद पर कितने दिन रहेगा, तो वह बड़े और ठोस फैसले लेने से बचता है। इससे प्रशासनिक कार्यों में देरी होती है और कई महत्वपूर्ण निर्णय लंबित रह जाते हैं। यह असमंजस न केवल अफसरों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पूरे शासन तंत्र की कार्यक्षमता पर असर डाल रहा है।
जमीनी असर: विकास की रफ्तार पर ब्रेक
सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निरंतरता बेहद जरूरी होती है। लेकिन जब हर कुछ दिनों में अधिकारी बदलते हैं, तो योजनाओं की प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं। इससे विकास कार्यों की रफ्तार प्रभावित होती है और जनता को अपेक्षित लाभ समय पर नहीं मिल पाता।
‘म्यूज़िकल चेयर’ बना प्रशासनिक ढांचा
राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी इन दिनों किसी गंभीर प्रशासनिक ढांचे से ज्यादा ‘म्यूज़िकल चेयर’ के खेल जैसी नजर आ रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां संगीत की जगह आदेश बजते हैं और कुर्सियां बदलने की गति इतनी तेज है कि कोई आराम से बैठ ही नहीं पा रहा।
जनता का सवाल: सरकार चल रही है या प्रयोगशाला?
लगातार हो रहे तबादलों ने आमजन के बीच यह धारणा बना दी है कि क्या राज्य में स्थिर शासन चल रहा है या फिर यह एक बड़ा प्रशासनिक प्रयोग बन गया है। हर नया आदेश एक नई कहानी लेकर आता है, लेकिन समाधान स्थायी नहीं दिखता।
रफ्तार अच्छी, लेकिन दिशा और स्थिरता भी जरूरी
सरकार की सक्रियता और तेजी निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन प्रशासन में संतुलन, स्थिरता और दीर्घकालिक सोच भी उतनी ही जरूरी है। केवल तेजी से फैसले लेने भर से सुशासन स्थापित नहीं होता, बल्कि उन फैसलों को जमीन पर टिकाऊ तरीके से लागू करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अगर यही स्थिति जारी रही, तो राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था ‘ट्रांसफर तांडव’ के नाम से जानी जाएगी—जहां काम से ज्यादा कुर्सियों का सफर चर्चा में रहेगा।
अब देखने वाली बात यह होगी कि यह तेज़ी स्थायी सुधार में बदलती है या फिर एक लंबे मजाक के रूप में याद रखी जाएगी।
