Written by : Sanjay kumar
क्या राजस्थान के सरकारी अस्पताल अब सुरक्षित नहीं रहे?
जोधपुर, 22 जून।
राजस्थान की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगातार उठ रहे सवाल अब गंभीर संकट का रूप लेते जा रहे हैं। कोटा और बीकानेर में प्रसूताओं की मौतों और संक्रमण के मामलों के बाद अब जोधपुर के पावटा जिला अस्पताल में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद 8 प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ने से एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली कटघरे में खड़ी हो गई है। इनमें दो महिलाओं की हालत इतनी गंभीर बताई जा रही है कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा, जबकि छह अन्य महिलाओं में सेप्टीसीमिया (खून में संक्रमण) के साथ किडनी लक्षण पाए गए हैं।
आखिर एक जैसी घटनाएं बार-बार क्यों दोहराई जा रही हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक के बाद एक सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं के साथ ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं? क्या ऑपरेशन थिएटरों की नियमित मॉनिटरिंग नहीं हो रही? क्या संक्रमण नियंत्रण की व्यवस्थाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार पिछली घटनाओं से कोई सबक लेने को तैयार नहीं है?
कोटा और बीकानेर की घटनाओं से क्या सीखा गया?
कोटा में मई माह के दौरान पांच प्रसूताओं की मौत के बाद बनी उच्च स्तरीय जांच समिति ने इलाज में लापरवाही की ओर संकेत किया था। बीकानेर में भी सिजेरियन के बाद कई महिलाओं की किडनी फेल हुई और दो की जान चली गई। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने ऐसी कौन-सी प्रभावी व्यवस्था लागू की, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकी जा सकें? जोधपुर की ताजा घटना बताती है कि जिम्मेदार तंत्र अब भी गहरी नींद में है।
कार्रवाई पहले क्यों नहीं, हादसे के बाद ही क्यों?
जोधपुर के पावटा अस्पताल का ऑपरेशन थिएटर जांच के लिए बंद कर दिया गया है, लेकिन यह कार्रवाई तब हुई जब आठ महिलाएं संक्रमण की चपेट में आ चुकी थीं। यदि समय रहते निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था मजबूत होती तो शायद यह स्थिति पैदा ही नहीं होती। सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग केवल हादसों के बाद जागता है?
क्या मातृत्व सेवाओं पर जनता का भरोसा टूट रहा है?
प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने आम जनता का भरोसा हिला दिया है। गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों के मन में यह डर बैठता जा रहा है कि अस्पताल इलाज का केंद्र है या संक्रमण का खतरा। सरकार को केवल जांच समितियां बनाकर और रिपोर्टों को फाइलों में दबाकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
जवाबदेही तय होगी या फिर सिर्फ जांच का आश्वासन मिलेगा?
जरूरत इस बात की है कि प्रदेशभर के सरकारी अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर, दवा आपूर्ति व्यवस्था, संक्रमण नियंत्रण प्रणाली और चिकित्सा प्रबंधन की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच कराई जाए। दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो तथा मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। केवल बयान और जांच नहीं, बल्कि ठोस सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है।
सरकार बताए—मां और नवजात की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
राजस्थान की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं पर उठ रहे ये सवाल केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संवेदनशील मानव जीवन से जुड़ा विषय हैं। यदि अब भी सरकार नहीं जागी तो यह संकट और गहरा सकता है। जनता जवाब चाहती है कि आखिर प्रसूताओं की जान के साथ बार-बार खिलवाड़ क्यों हो रहा है, जिम्मेदार कौन है और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार की ठोस कार्ययोजना क्या है?
