Written by : Sanjay kumar
मुंबई, 21 जनवरी 2026:
भारतीय रुपया आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक बार फिर से सर्वाधिक निचले स्तर पर गिर गया। इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया दिन के दौरान 91.74 तक फिसलते हुए अंत में 91.73 (प्रारंभिक/अस्थायी) पर बंद हुआ, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले रुपया 16 दिसंबर 2025 को 91.14 के स्तर तक गिर चुका था।
मुख्य कारण और बाजार प्रतिक्रियाएँ
📌 भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता:
वैश्विक स्तर पर ग्रीनलैंड के मुद्दे को लेकर अमेरिका-यूरोप के बीच बढ़ते टेंशन और संभावित व्यापार टैरिफ की आशंकाओं ने जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (Risk-Off Sentiment) को ऊँचा कर दिया है। इससे निवेशक सुरक्षित संपত্তियों जैसे अमेरिकी डॉलर की ओर भाग रहे हैं, जो उभरती बाजार मुद्राओं पर दबाव बढ़ा रहा है।
📌 विदेशी पूंजी का बहिर्वाह (FPI Outflows):
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की भारतीय बाजार से निरंतर बिकवाली ने रुपये पर दबाव और तेज किया है। जनवरी 2026 के पहले 20 दिनों में ही अपेक्षाकृत बड़ी राशि डॉलर के लिए बेची गई, जिससे रुपया कमजोर हुआ।
📌 उच्च डॉलर माँग व आयात दबाव:
धातु, ऊर्जा और कच्चे तेल जैसे प्रमुख आयातों के लिए डॉलर की उच्च माँग के कारण रुपये की गिरावट को और बल मिला है — विशेष रूप से जब भारत का व्यापार घाटा विस्तृत है और निर्यात-आधारित डॉलर प्रवाह अपेक्षित मात्रा में नहीं आया।
📌 आरबीआई की प्रतिक्रिया और मुद्रा नीति:
विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) फिलहाल बाजार को अधिकतर “प्रवाह-चालित” (Flow-Driven) कमजोरी को सहने दे रहा है और अत्यधिक उतार-चढ़ाव पर ही हस्तक्षेप कर रहा है, बजाय किसी ठोस निश्चल समर्थन स्तर की रक्षा करने के।
विशेषज्ञों की राय — सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोण
➤ सकारात्मक पहलू
✔️ निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में मदद:
कमजोर रुपये से भारत के निर्यातों को अधिक डॉलर-आधारित कीमतों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है, जिससे टेक्स्टाइल, फार्मा तथा सेवाएँ निर्यात क्षेत्र लाभ उठा सकते हैं।
✔️ भारी मुद्रा भंडार से सामना शक्ति:
भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जो RBI को अत्यधिक बाजारी तनावों से निपटने में सक्षम बनाता है, खासकर आवश्यक स्थिति में हस्तक्षेप के लिए।
➤ नकारात्मक पहलू
⚠️ आयात लागत और मुद्रास्फीति पर दबाव:
कमजोर रुपये से कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जो अंततः उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों और मुद्रास्फीति को प्रभावित करेगा।
⚠️ निवेशकों का वित्तीय जोखिम:
बढती अस्थिरता से विदेशी निवेश कम हो सकता है, जिससे घरेलू बाजारों में पूंजी का प्रवाह मंद पड़ सकता है और दीर्घकालिक वित्तीय वैश्विक निवेश आकर्षण पर असर पड़ सकता है।
आर्थिक परिदृश्य और आगे की राह
📊 वर्तमान चलन:
जनवरी माह में रुपये में लगभग 1.5% की गिरावट देखने को मिली है, जो संकेत देती है कि मुद्रा दबाव अभी भी जारी है।
📈 भविष्य की चुनौतियाँ:
यदि वैश्विक जोखिम तत्व, डॉलर-मजबूती और पूंजी बहिर्वाह जारी रहते हैं, तो रुपये के लिए समर्थन स्तर ढूँढना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। वहीं, यदि अमेरिका–भारत व्यापार समझौते के परिणाम सकारात्मक आते हैं और विदेशी निवेश आकर्षण बढ़ता है, तो रुपये को कुछ स्थिरता मिल सकती है।
निष्कर्ष
भारतीय रुपया आज इतिहास के निचले स्तर पर पहुंच गया है। इसके पीछे वैश्विक निवेश धारणा, पूंजी बहिर्वाह, भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर की मजबूत माँग जैसे प्रमुख कारण हैं। हालांकि यह स्थिति निर्यातकों के लिए कुछ अवसर प्रदान कर सकती है, वहीं आयात लागत बढ़ने, मुद्रास्फीति तथा बाजार जोखिमों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। आगे आने वाले आर्थिक संकेत, आरबीआई की मुद्रा नीतियाँ, और वैश्विक वित्तीय परिदृश्य रुपये की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
