Written by : प्रमुख संवाद
कोटा, 26 फरवरी। आधुनिक चिकित्सा तकनीक, विशेषज्ञ उपचार और समर्पित प्रयासों के बल पर कोटा हार्ट हॉस्पिटल ने एक अत्यंत गंभीर नवजात शिशु को नया जीवन प्रदान कर चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। यह मामला न केवल हाड़ौती क्षेत्र बल्कि देशभर के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया है।
जानकारी के अनुसार शिशु का जन्म पूर्ण अवधि में लगभग 3 किलोग्राम वजन के साथ हुआ था, किंतु जन्म के तुरंत बाद दूध सांस की नली में चले जाने से उसकी स्थिति गंभीर हो गई। श्वसन तंत्र प्रभावित होने के कारण उसे वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता पड़ी। 63 दिन की आयु में जब शिशु को अस्पताल लाया गया, तब वह अत्यंत नाजुक स्थिति में था। वह अचेत अवस्था में था, तेज बुखार से ग्रस्त था, हाथ-पैरों में अकड़न थी तथा उसका वजन घटकर 2.8 किलोग्राम रह गया था। छाती में धंसाव के कारण उसे सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई हो रही थी और वह पूर्णतः जीवन रक्षक मशीन पर निर्भर था।
नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. महेंद्र गुप्ता ने बताया कि शिशु को एमएए योजना के अंतर्गत भर्ती कर हाई फ़्रीक्वेंसी ऑसिलेटरी (एच.एफ.ओ.) वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। नली के माध्यम से मां का दूध देकर उसे आवश्यक पोषण प्रदान किया गया। उपचार के दौरान सीटी स्कैन, सोनोग्राफी एवं विभिन्न रक्त जांचें की गईं। प्रारंभिक चरण में वेंटिलेटर से हटाने के पाँच प्रयास असफल रहे, क्योंकि प्रत्येक बार उसके फेफड़े पुनः सिकुड़ जाते थे। तत्पश्चात नेज़ल एच.एफ.ओ. तकनीक अपनाई गई, जिसमें सफलता मिली। अस्पताल में कुल 34 दिनों तक उसे श्वसन मशीन पर रखा गया, जबकि जन्म से लेकर कुल 97 दिन तक वह वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहा।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. नीता जिंदल के अनुसार, इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहकर पूर्णतः स्वस्थ होने का यह संभवतः देश का पहला रिपोर्टेड मामला है। हाड़ौती क्षेत्र में इस उन्नत तकनीक का यह प्रथम प्रयोग था, जिसने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विशेषज्ञ उपचार, संतुलित पोषण एवं सतत निगरानी के परिणामस्वरूप शिशु की स्थिति में निरंतर सुधार हुआ। लगभग एक माह पूर्व उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। हालिया एक्स-रे और अन्य जांचों में उसके फेफड़े सामान्य पाए गए हैं तथा उसका वजन भी नियमित रूप से बढ़ रहा है।
अस्पताल के निदेशक डॉ. राकेश जिंदल ने बताया कि इस जटिल उपचार की विशेष उपलब्धि यह रही कि पूरे उपचार काल में शिशु को ट्रेकियोस्टॉमी (सांस की नली में स्थायी छेद) की आवश्यकता नहीं पड़ी, जो अपने आप में बड़ी सफलता है।
इसी क्रम में अस्पताल ने एक अन्य गंभीर मामले में भी सफलता प्राप्त की। दो माह के एक शिशु को अत्यधिक श्वसन कष्ट के साथ एमएए योजना के अंतर्गत भर्ती किया गया। जांचों में पाया गया कि उसका दायां फेफड़ा पूर्णतः सिकुड़ चुका था। तत्काल वेंटिलेटर सपोर्ट प्रदान कर समुचित उपचार प्रारंभ किया गया। तीन दिन बाद स्थिति में सुधार होने पर उसे नेज़ल एच.एफ.ओ. मशीन पर शिफ्ट किया गया। कुल 10 दिनों तक एनआईसीयू में विशेषज्ञ निगरानी में उपचार के बाद शिशु को स्वस्थ अवस्था में छुट्टी दे दी गई। वर्तमान में वह पूर्णतः स्वस्थ है और उसके दोनों फेफड़े सामान्य रूप से कार्य कर रहे हैं।
