“आसाराम अंदर, राम रहीम बाहर! आजीवन सजा के बाद भी बार-बार राहत क्यों? कानून, पैरोल और सिस्टम पर बड़े सवाल”

Sanjay kumar, 27 मई 2026।

दो बड़े नाम, फिर चर्चा में न्याय व्यवस्था

देश में दो बड़े और विवादित धार्मिक चेहरों को लेकर एक बार फिर न्याय व्यवस्था और सरकारी सिस्टम पर बहस तेज हो गई है। एक तरफ नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने आसाराम की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए सरेंडर के आदेश दिए हैं। दूसरी तरफ डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर 30 दिन की पैरोल मिल गई है।

कानून समान या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग रास्ता?

यहीं से देशभर में एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या कानून सबके लिए समान है या प्रभावशाली लोगों के लिए कानून की व्याख्या और रास्ते अलग दिखाई देते हैं?

आसाराम को किन मामलों में सजा मिली?

आसाराम लंबे समय से विभिन्न आपराधिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। वर्ष 2018 में जोधपुर की विशेष अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद गुजरात के गांधीनगर से जुड़े एक अन्य महिला शिष्या से जुड़े मामले में भी उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली। हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने नाबालिग यौन उत्पीड़न मामले में उनकी उम्रकैद को बरकरार रखते हुए सरेंडर के आदेश दिए हैं।

आसाराम कब से राहत पर थे?

आसाराम को स्वास्थ्य और आयु संबंधी कारणों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत के रूप में अस्थायी राहत मिली हुई थी। इसी राहत के तहत वह कुछ समय से जेल से बाहर थे। लेकिन हाईकोर्ट के हालिया आदेश के बाद अब उन्हें पुनः सरेंडर करना होगा।

राम रहीम को बार-बार पैरोल, सवाल लगातार

राम रहीम वर्ष 2017 से दो साध्वियों से दुष्कर्म और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में सजा काट रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें बार-बार पैरोल और फरलो मिलती रही है। दूसरी ओर आसाराम को इस बार अदालत से राहत नहीं मिली और उन्हें सरेंडर के आदेश का सामना करना पड़ा।

कब-कब मिली राम रहीम को पैरोल और फरलो?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गुरमीत राम रहीम को 2017 के बाद से लगभग 16वीं बार राहत मिली है। प्रमुख अवधि इस प्रकार बताई जाती है:

  • अक्टूबर 2020 : 1 दिन पैरोल
  • मई 2021 : 1 दिन पैरोल
  • फरवरी 2022 : 21 दिन फरलो
  • जून 2022 : 30 दिन पैरोल
  • अक्टूबर 2022 : 40 दिन पैरोल
  • जनवरी 2023 : 40 दिन पैरोल
  • जुलाई 2023 : 30 दिन पैरोल
  • नवंबर 2023 : 21 दिन फरलो
  • जनवरी 2024 : 50 दिन पैरोल
  • अगस्त 2024 : 21 दिन फरलो
  • अक्टूबर 2024 : 20 दिन पैरोल
  • जनवरी 2025 : 30 दिन पैरोल
  • अप्रैल 2025 : 21 दिन फरलो
  • अगस्त 2025 : 40 दिन पैरोल
  • जनवरी 2026 : 40 दिन पैरोल
  • मई 2026 : 30 दिन पैरोल

इन अवधियों को जोड़कर देखें तो वह सजा अवधि के दौरान लंबे समय तक जेल से बाहर रह चुके हैं, जिस पर समय-समय पर बहस भी होती रही है।

आजीवन सजा के बाद फिर राहत क्यों?

लेकिन जनता के मन में अब एक और गंभीर प्रश्न उभर रहा है—जब अदालतें किसी व्यक्ति को गंभीर अपराधों में दोषी मानते हुए आजीवन कारावास जैसी सजा सुनाती हैं, तो फिर बार-बार पैरोल देने का आधार क्या होता है?

यदि न्यायालय ने माना कि अपराध इतना गंभीर था कि कठोर सजा आवश्यक है, तो आम लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बार-बार जेल से बाहर आने की व्यवस्था का उद्देश्य क्या है? क्या पैरोल केवल मानवीय और कानूनी प्रावधान है, या उसका उपयोग ऐसे मामलों में अलग तरीके से दिखाई देता है?

कानून क्या कहता है?

यह समझना जरूरी है कि पैरोल और जमानत एक चीज नहीं हैं। जमानत मुकदमे के दौरान राहत होती है, जबकि पैरोल सजा काट रहे कैदी को नियमों के तहत सीमित अवधि की अस्थायी रिहाई देती है। कानून के अनुसार यह सुविधा कैदी के व्यवहार, पारिवारिक परिस्थितियों, प्रशासनिक कारणों और अन्य मानकों पर आधारित हो सकती है।

क्या हर कैदी को मिलता है ऐसा अवसर?

लेकिन यहां एक बड़ा जनसवाल सामने आता है—क्या समान परिस्थितियों में हर सामान्य कैदी को भी इतनी ही बार राहत मिलती है?

राजनीतिक बहस और जनता के सवाल

इसी के साथ राजनीतिक गलियारों में भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं कि राम रहीम को बार-बार पैरोल दिए जाने के समय और परिस्थितियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। चूंकि डेरा सच्चा सौदा का कई राज्यों में बड़ा समर्थक आधार माना जाता है, इसलिए विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने पहले भी आरोप लगाए हैं कि इन फैसलों के राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं। हालांकि इन आरोपों को लेकर कोई निर्णायक न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

यही कारण है कि जनता पूछ रही है—क्या यह केवल कानूनी प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक गणित भी काम करता है? क्या सरकारें सिर्फ कानून के अनुसार चल रही हैं, या बड़े प्रभाव वाले मामलों में फैसलों को लेकर अलग धारणाएं बनती हैं?

सबसे बड़ा सवाल—व्यक्ति नहीं, व्यवस्था

लोकतंत्र में अदालतों के फैसलों का सम्मान आवश्यक है, लेकिन व्यवस्था पर सवाल उठाना भी नागरिक अधिकार है। सवाल किसी व्यक्ति विशेष से अधिक उस भरोसे का है जो आम आदमी कानून और न्याय व्यवस्था पर करता है।

आज चर्चा केवल आसाराम और राम रहीम की नहीं है। चर्चा उस विश्वास की है जो जनता के मन में होना चाहिए—कि कानून का तराजू हर व्यक्ति के लिए एक समान है, चाहे वह सामान्य नागरिक हो या बड़ा और प्रभावशाली नाम।

Pramukh Samvad

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