“ट्रांसजेंडर पहचान पर नया कानून: स्व-पहचान खत्म, मेडिकल जांच अनिवार्य—देशभर में विरोध तेज”

Written by : Sanjay kumar


परिभाषा, अधिकार और प्रक्रिया में बड़े बदलाव से राष्ट्रीय बहस तेज

नई दिल्ली, 19 मार्च 2026।
लोकसभा में 13 मार्च 2026 को पेश किए गए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 ने देशभर में व्यापक बहस और विरोध को जन्म दिया है। यह संशोधन न केवल ट्रांसजेंडर पहचान की परिभाषा को बदलता है, बल्कि 2014 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से मिले “स्व-पहचान के अधिकार” को भी प्रभावित करता है।


इतिहास और कानूनी पृष्ठभूमि: कैसे मिले अधिकार

भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों की कानूनी मान्यता वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक “नालसा निर्णय” से शुरू हुई। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट कहा था कि हर व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान स्वयं तय करने का मौलिक अधिकार है। साथ ही “तीसरे जेंडर” को कानूनी मान्यता दी गई और सरकार को निर्देश दिए गए कि ट्रांसजेंडर समुदाय को शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं में विशेष सुविधाएं और आरक्षण दिया जाए।

इसके बाद वर्ष 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) कानून लागू किया गया। इस कानून की खास बात यह थी कि इसकी परिभाषा व्यापक थी। इसमें उन सभी लोगों को शामिल किया गया जो जन्म के समय निर्धारित लिंग से अलग पहचान रखते हैं—जैसे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, जेंडर क्वीर, इंटरसेक्स व्यक्ति और पारंपरिक समुदाय (किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता)।
इस कानून में यह भी स्पष्ट किया गया था कि जेंडर पहचान के लिए किसी व्यक्ति को सर्जरी करवाना जरूरी नहीं है।

हालांकि, पहचान प्रमाण पत्र के लिए जिला मजिस्ट्रेट से प्रमाणन की प्रक्रिया तय की गई थी, जिसका उस समय भी कई कार्यकर्ताओं ने विरोध किया था और इसे स्व-पहचान के अधिकार के खिलाफ बताया था।


सरकार का पक्ष: संशोधन क्यों जरूरी बताया गया

सरकार के अनुसार, 2019 के कानून को लागू करने में कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आईं। सबसे बड़ी समस्या ट्रांसजेंडर की “अस्पष्ट परिभाषा” बताई गई, जिसके कारण यह तय करना मुश्किल हो रहा था कि वास्तविक लाभार्थी कौन हैं।

सरकार का तर्क है कि:

  • अस्पष्ट परिभाषा के कारण योजनाओं का लाभ सही लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा था
  • पुलिस, न्यायालय और पर्सनल लॉ के मामलों में भ्रम की स्थिति बन रही थी
  • कुछ आपराधिक मामलों में ट्रांसजेंडर पहचान का दुरुपयोग होने की शिकायतें सामने आईं

सरकार ने यह भी दावा किया कि कुछ मामलों में लोगों—विशेषकर बच्चों और कमजोर वर्ग के लोगों—का अपहरण कर उन्हें जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है और बाद में उनका आर्थिक शोषण किया जाता है, जैसे भीख मंगवाना।

इन्हीं कारणों के आधार पर सरकार ने कहा कि कानून को “सख्त और स्पष्ट” बनाना आवश्यक है।


नया संशोधन: क्या-क्या बड़े बदलाव प्रस्तावित

1. ट्रांसजेंडर की परिभाषा सीमित

नए विधेयक में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को काफी सीमित कर दिया गया है। अब केवल:

  • पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय (किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता)
  • इंटरसेक्स व्यक्ति
  • और वे लोग जिन्हें जबरन ट्रांसजेंडर बनाया गया हो

इन्हें ही ट्रांसजेंडर की श्रेणी में शामिल करने का प्रस्ताव है।

इसका मतलब यह है कि जो लोग केवल अपनी स्व-पहचान के आधार पर खुद को ट्रांसजेंडर मानते हैं, वे इस नई परिभाषा से बाहर हो सकते हैं।


2. स्व-पहचान का अधिकार समाप्त करने का प्रस्ताव

2019 के कानून में शामिल धारा 4(2), जिसमें व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान खुद तय करने का अधिकार दिया गया था, उसे हटाने का प्रस्ताव है।
यह संशोधन इस विधेयक का सबसे बड़ा और विवादित बदलाव माना जा रहा है।


3. मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य

अब ट्रांसजेंडर पहचान के लिए:

  • पहले सरकारी मेडिकल अधिकारी (CMO/Medical Superintendent) से प्रमाण पत्र लेना होगा
  • इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट (DM) को आवेदन देना होगा
  • जांच के बाद ही पहचान पत्र जारी किया जाएगा

इससे प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक जटिल और नियंत्रित हो जाएगी।


4. सर्जरी की जानकारी सरकार को देना अनिवार्य

यदि कोई व्यक्ति जेंडर परिवर्तन से जुड़ी सर्जरी करवाता है, तो उसकी जानकारी अस्पताल द्वारा सीधे जिला प्रशासन को दी जाएगी।


ट्रांसजेंडर समुदाय की प्रतिक्रिया: क्यों हो रहा विरोध

इस विधेयक के खिलाफ देशभर में ट्रांसजेंडर समुदाय में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। दिल्ली, मुंबई, पुणे और हैदराबाद सहित कई शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं।

समुदाय की प्रमुख आपत्तियां इस प्रकार हैं:

1. पहचान पर नियंत्रण का आरोप

कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कानून व्यक्ति की अपनी पहचान तय करने की स्वतंत्रता छीनता है और इसे सरकार के नियंत्रण में लाता है।

2. निजता के अधिकार का उल्लंघन

मेडिकल जांच और सर्जरी की जानकारी अनिवार्य करने को निजी जीवन में दखल बताया जा रहा है।

3. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ

समुदाय का मानना है कि यह संशोधन 2014 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की भावना के विपरीत है, जिसमें स्व-पहचान को मौलिक अधिकार माना गया था।

4. आपराधिक छवि पेश करने का आरोप

विधेयक में प्रयुक्त भाषा को लेकर भी कड़ी आपत्ति जताई गई है। समुदाय का कहना है कि इसमें ट्रांसजेंडर लोगों को संदेहास्पद या अपराध से जुड़ा हुआ दिखाने की कोशिश की गई है।

5. बिना परामर्श कानून बनाने का आरोप

कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि इस संशोधन से पहले ट्रांसजेंडर समुदाय या राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद से कोई व्यापक सलाह-मशविरा नहीं किया गया।


कानूनी चिंताएं और विशेषज्ञों की राय

कुछ विधि विशेषज्ञों का कहना है कि विधेयक में शामिल दंड प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और उनकी व्याख्या व्यापक हो सकती है। इससे यह खतरा पैदा होता है कि समुदाय के भीतर आपसी सहयोग या समर्थन को भी गलत रूप में देखा जा सकता है।

इसके अलावा, कुछ प्रतिनिधियों ने आशंका जताई है कि इस तरह के प्रावधान ऐतिहासिक रूप से उन कानूनों की याद दिलाते हैं, जिनमें कुछ समुदायों को जन्मजात अपराधी मान लिया गया था।


अधिकार बनाम नियंत्रण की बहस

ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 ने देश में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है—क्या कानून का उद्देश्य केवल लाभार्थियों को सीमित करना है या व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पहचान की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।

एक ओर सरकार इसे पारदर्शिता और लक्षित लाभ का माध्यम बता रही है, वहीं दूसरी ओर ट्रांसजेंडर समुदाय इसे अपने अधिकारों और अस्तित्व पर खतरा मान रहा है।

अब सभी की नजरें संसद की आगे की कार्यवाही और संभावित संशोधनों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि देश में ट्रांसजेंडर अधिकारों की दिशा क्या होगी।


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