Written by : प्रमुख संवाद
कोटा, 20 मार्च 2026।
भारत की प्राचीन संस्कृति एवं विचारधारा “वसुधैव कुटुंबकम” तथा “सर्वधर्म समभाव” को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के उद्देश्य से निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। यह पहल माननीय सरसंघचालक एवं प्रधानमंत्री के विजन से प्रेरित है, जिसका लक्ष्य संवाद, शांति और सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ावा देना है। यह जानकारी प्रेस को संबोधित करते हुए नोएडा के पूज्य डॉ सुशील गोस्वामी महाराज ने दी।

इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ सामने आई हैं। ईरान जैसे संवेदनशील विषय में हमारे प्रयासों से वार्ता प्रारंभ होने का मार्ग प्रशस्त हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप एलपीजी आपूर्ति संभव हो सकी।
हाल ही में चल रहे ईरान युद्ध के दौरान, होर्मुज़ (Strait of Hormuz) मार्ग बाधित होने से भारत के कई जहाज रुके हुए थे, लेकिन पूज्य महाराज के प्रयासों के फलस्वरूप यह मार्ग पुनः सुचारू हो सका, जिससे एलपीजी गैस से भरे जहाज सुरक्षित रूप से भारत पहुँच पाए।
यह पहल दर्शाती है कि सकारात्मक संवाद के माध्यम से जटिल वैश्विक समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है।
सांस्कृतिक क्षेत्र में, रामलीला शोध संस्थान द्वारा आधुनिक तकनीक के माध्यम से भारतीय विरासत को विश्व के विभिन्न देशों तक पहुँचाने का सफल कार्य किया गया है। लाइट एवं साउंड तकनीक के उपयोग से अब तक स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, अमेरिका, दुबई, इंडोनेशिया, वेस्टइंडीज और थाईलैंड सहित अनेक देशों में रामलीला मंचन किया जा चुका है, जिससे भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान मिली है।
कोटा में भी इसी प्रकार के भव्य सांस्कृतिक आयोजन की योजना है, किंतु उपयुक्त स्थान एवं सक्षम आयोजकों के अभाव में यह अभी तक संभव नहीं हो पाया है। इस संदर्भ में आयोजन की जिम्मेदारी हिमालय परिवार के प्रदेश अध्यक्ष सचिदानंद पारीक द्वारा संभाली जा रही है, और स्थानीय सहयोग मिलने पर यह पहल पर्यटन एवं रोजगार के नए अवसर उत्पन्न कर सकती है।
साथ ही, प्रधानमंत्री के दूरदर्शी विचारों को आगे बढ़ाते हुए, ऑस्ट्रेलिया के संत डॉ. मोहन के नेतृत्व में केरल में एक व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जा रहा है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
“मन की बात” में व्यक्त पर्यटन विकास की सोच के अनुरूप, कोटा एवं आसपास के क्षेत्रों में सांस्कृतिक रथ, रामलीला मंचन एवं अन्य आयोजन प्रारंभ कर क्षेत्रीय विकास को नई दिशा दी जा सकती है।
अंततः, यह पहल केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पहचान को वैश्विक स्तर पर सुदृढ़ करने, सामाजिक समरसता बढ़ाने एवं स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
