Written by : Sanjay kumar
नागपुर/वर्धा, 26 अप्रैल।
महाराष्ट्र के वर्धा जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कानून, खेती और प्रकृति—तीनों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। जहां एक ओर तोतों ने किसान के अनार के बाग को निशाना बनाया, वहीं दूसरी ओर किसान ने हार नहीं मानी और आखिरकार 10 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय हासिल कर लिया।
🌳 जब तोतों ने बनाया अनार को निशाना
मामला मई 2016 का है, जब वर्धा के हिंगी गांव के किसान महादेव डेकाटे के अनार के करीब 200 पेड़ों पर जंगली तोतों ने हमला बोल दिया। देखते ही देखते मेहनत से तैयार फसल बर्बाद हो गई। किसान के सामने बड़ी आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई, लेकिन उन्होंने इस नुकसान के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया।
⚖️ कोर्ट में 10 साल की जंग, आखिर मिली जीत
किसान ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और मामला पहुंचा बंबई हाई कोर्ट की नागपुर पीठ तक। लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने साफ कहा कि तोते भी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत संरक्षित “वन्य प्राणी” हैं, और इनके कारण हुए नुकसान की भरपाई करना सरकार की जिम्मेदारी है।
💰 सरकार को भरना होगा मुआवजा
अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि किसान को 200 पेड़ों के नुकसान के हिसाब से प्रति पेड़ 200 रुपये का मुआवजा दिया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजा केवल हाथी या भैंस जैसे बड़े जानवरों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि छोटे पक्षियों द्वारा हुए नुकसान को भी गंभीरता से लेना होगा।
🌿 किसानों और वन्यजीवों के बीच संतुलन का संदेश
इस फैसले ने एक अहम संदेश दिया है—यदि किसानों को नुकसान की भरपाई नहीं मिलेगी, तो वे मजबूरी में ऐसे कदम उठा सकते हैं जो वन्यजीवों के लिए हानिकारक हों। ऐसे में यह निर्णय खेती और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
👉 कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ अनार और तोतों की कहानी नहीं, बल्कि हक, संघर्ष और न्याय की मिसाल बन गया है—जहां अंत में किसान की मेहनत को उसका अधिकार मिला।
