Written by : Sanjay kumar
बीकानेर, 10 जून। पीबीएम अस्पताल में पांच प्रसूताओं की किडनी प्रभावित होने के मामले को राजस्थान सरकार ने गंभीरता से लिया है। राज्य सरकार ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इसके बाद अस्पताल प्रशासन और मेडिकल कॉलेज पूरे दिन मामले की गहन पड़ताल में जुटे रहे। मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा एवं अस्पताल अधीक्षक डॉ. बी.सी. घीया ने आईसीयू में भर्ती प्रसूताओं की स्थिति का जायजा लिया तथा अब तक किए गए उपचार की जानकारी प्राप्त की।
केस हिस्ट्री और उपचार प्रक्रिया की समीक्षा
अधिकारियों ने प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के चिकित्सकों के साथ बैठक कर प्रत्येक मरीज की केस हिस्ट्री, भर्ती की तिथि, प्रसव की प्रकृति और उपचार प्रक्रिया की विस्तार से समीक्षा की। प्रभावित प्रसूताओं की फाइलों का अध्ययन करते हुए सिजेरियन और सामान्य प्रसव से जुड़े सभी पहलुओं की जानकारी जुटाई गई। साथ ही प्रसव के दौरान दी गई दवाओं, इंजेक्शनों और अन्य चिकित्सकीय प्रक्रियाओं की भी बारीकी से जांच की गई।
दो सामान्य और तीन सिजेरियन प्रसव के मामले
अस्पताल अधीक्षक डॉ. बी.सी. घीया के अनुसार प्रभावित महिलाओं में दो की सामान्य डिलीवरी हुई थी, जबकि तीन महिलाओं का सिजेरियन ऑपरेशन किया गया था। सभी मामलों में उपचार की पूरी श्रृंखला की समीक्षा की जा रही है। मामला सामने आने के बाद मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने चिकित्सकों की टीम के साथ अपनी रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को भेज दी है।
जोधपुर की विशेषज्ञ टीम ने भी जुटाए तथ्य
मामले की जांच के लिए जोधपुर मेडिकल कॉलेज से आई विशेषज्ञ टीम ने भी पीबीएम अस्पताल का निरीक्षण किया और आवश्यक तथ्य एकत्रित किए। यह टीम अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को सौंपेगी, जिससे पूरे घटनाक्रम के कारणों का निष्पक्ष आकलन किया जा सके।
प्रसवोत्तर तीन माह को बताया सबसे संवेदनशील
सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ने बताया कि प्रसव के बाद का तीन माह का समय महिलाओं के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है। इस दौरान संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव, रक्त के थक्के बनने तथा अन्य अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी गंभीर जटिलताएं विकसित हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि गर्भावस्था के दौरान खून की कमी, अनियंत्रित रक्तचाप और अत्यधिक रक्तस्राव जैसी स्थितियां कई बार प्रसूता के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं और इससे गुर्दों सहित अन्य अंग भी प्रभावित हो सकते हैं।
प्रत्येक प्रसूता में अलग-अलग जटिलताएं
प्राचार्य डॉ. शर्मा के अनुसार प्रभावित महिलाओं में एक जैसी चिकित्सकीय स्थिति नहीं थी। प्रीति में अनियंत्रित रक्तचाप, मस्तिष्क में सूजन और एचईएलएलपी सिंड्रोम जैसी जटिलताएं पाई गईं, जिनका असर गुर्दों पर पड़ा। राहिला में मल्टी ऑर्गन इम्पैक्ट के संकेत मिले, जबकि शारदा में संक्रमण की स्थिति सामने आई। तारादेवी और इमरती में प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव हुआ, जो उपचार के बावजूद नियंत्रित नहीं हो सका और इससे किडनी प्रभावित हुई।
दवा आपूर्ति भी जांच के घेरे में
कोटा और बीकानेर में सामने आए मामलों के बाद दवा आपूर्ति व्यवस्था और उपयोग में ली गई औषधियों की भी जांच शुरू कर दी गई है। हालांकि अस्पताल प्रशासन का कहना है कि दोनों स्थानों पर अलग-अलग कंपनियों की दवाओं की आपूर्ति हुई थी। अस्पताल अधीक्षक डॉ. बी.सी. घीया के अनुसार आरएमएससीएल के माध्यम से पांच हजार ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन प्राप्त हुए थे, जबकि स्थानीय स्तर पर भी दो चरणों में 25 हजार इंजेक्शन खरीदे गए थे।
दवाओं के सैंपल जांच के लिए भेजे
जिला सहायक औषधि नियंत्रक देवेंद्र केदावत ने बताया कि प्रसव से पहले और बाद में उपयोग में ली जाने वाली दवाओं एवं इंजेक्शनों के नमूने एकत्रित कर सरकारी प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामले के पीछे कोई दवा संबंधी कारण है या प्रसवोत्तर जटिलताएं जिम्मेदार हैं।
