मथुराधीश मंदिर में मनेगा 30 अप्रैल को नृसिंह प्राकट्य उत्सव, गोधूलि वेला में होंगे भगवान के जन्म के दर्शन

Written by : प्रमुख संवाद

​कोटा, 29 अप्रैल।
​शुद्धाद्वैत प्रथम पीठ श्री बड़े मथुराधीश मंदिर, पाटनपोल में 30 अप्रैल को भगवान नृसिंह का प्राकट्य उत्सव अटूट श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। पुष्टिमार्गीय परंपराओं के अनुसार आयोजित होने वाले इस उत्सव में विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। मंदिर के व्यवस्थापक चेतन शेठ ने जानकारी देते हुए बताया कि उत्सव का शुभारंभ प्रातः काल मंगला दर्शन के साथ होगा। इसके पश्चात प्रभु को चंदन, आंवला और विशेष फुलेल से अभ्यंग कराया जाएगा। ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी को देखते हुए पुष्टिमार्गीय सेवा पद्धति के अनुसार प्रभु को शीतलता प्रदान करने के विशेष जतन किए जाएंगे। इसके अंतर्गत संध्या आरती के बाद मंदिर के चौक में शीतल जल का छिड़काव होगा।

उन्होंने बताया कि ​भगवान नृसिंह का प्राकट्य न तो दिन में हुआ था और न ही रात में, बल्कि वह संध्या की गोधूलि वेला में स्तंभ को फाड़कर प्रकट हुए थे। इसी भाव को आत्मसात करते हुए मंदिर में संध्या आरती के पश्चात सायं 6:45 बजे (सेवानुकूल समय) नृसिंह जन्म के विशेष दर्शन होंगे। इस अलौकिक अवसर पर ठाकुर जी के सम्मुख शालिग्राम जी को पंचामृत स्नान कराया जाएगा। नृसिंह अवतार को प्रभु का अत्यंत उग्र रूप माना जाता है, अतः उनके क्रोध के शमन और उन्हें ठंडक पहुँचाने के मनोरथ से शयन दर्शन के समय विशेष ‘शीतल सामग्री’ का भोग अर्पित किया जाएगा। मंदिर में इस दौरान होने वाले विशेष कीर्तनों में नृसिंह लीला के पदों का गान किया जाएगा।

​पुष्टिमार्ग में अवतारों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रथम पीठ के युवराज मिलन कुमार बाबा ने बताया कि मार्ग में मुख्य रूप से चार अवतारों—श्री राम, श्री कृष्ण, नृसिंह भगवान और वामन अवतार को विशेष मान्यता प्राप्त है। ये चारों अवतार प्रभु ने अपने उन भक्तों पर कृपा करने के लिए लिए थे, जो पूर्णतः नि:साधन थे और केवल प्रभु के आश्रय में थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन अवतारों के माध्यम से की गई लीलाओं को ‘पुष्टिलीला’ माना जाता है। जो भक्त और भगवान के बीच अनन्य और निस्वार्थ प्रेम का जीवंत प्रतीक हैं। प्रह्लाद की रक्षा के लिए स्तंभ से प्रकट होना प्रभु की भक्तवत्सलता की पराकाष्ठा है।

ये होगा दर्शनों का समय
​उत्सव के दिन दर्शनों का समय विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। प्रातः 6:30 बजे मंगला के दर्शन होंगे। जिसके बाद 11 बजे राजभोग के दर्शन खुलेंगे। दोपहर में 4 बजे उत्थापन और 5 बजे भोग आरती के दर्शन होंगे। सायंकाल 6:45 बजे शालिग्राम जी का पंचामृत स्नान एवं जन्म के मुख्य दर्शन होंगे। इस दिन ‘ग्वाल भोग’ के दर्शन नहीं होंगे।

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