“599 संविदा फार्मासिस्ट हटे—राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था दवा काउंटर पर ही लाचार”

Written by : Sanjay kumar

जयपुर/ कोटा, 30 अप्रैल 2026।
राजस्थान के चिकित्सा तंत्र में एक गंभीर प्रशासनिक फैसला सामने आया है, जिसमें 599 संविदा फार्मासिस्टों की सेवाएं 10 अप्रैल को समाप्त कर दी गईं। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब पहले से ही सरकारी अस्पतालों, सीएचसी, पीएचसी, डिस्पेंसरी और जनता क्लिनिक में दवा वितरण व्यवस्था कमजोर स्थिति में चल रही है। चिकित्सा विभाग के अपने पोर्टल और उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य में दवा काउंटरों की संख्या हजारों में है, लेकिन इन पर तैनात प्रशिक्षित फार्मासिस्टों की भारी कमी पहले से ही बनी हुई है। ऐसे में संविदा कर्मियों को हटाना सीधे तौर पर मरीजों की सुविधा पर चोट माना जा रहा है। रिक्त पदों की समस्या से दो-दो हाथ करते राजकीय चिकित्सालयों में हालत ये हो गए है कि नियमित फॉर्मासिस्ट वीकली ऑफ तक नहीं ले पा रहे है। कई चिकित्सालयों में ये स्थितियां खड़ी हो गई है कि एएनएम-जीएनएम तथा प्रशिक्षु नर्सिंग विद्यार्थियों के हाथों दवाएं बांटने की मजबूरी नजर आ रही है।

दवा काउंटर बनाम फार्मासिस्ट की उपलब्धता
राजस्थान में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों—मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), शहरी डिस्पेंसरी और जनता क्लिनिक—पर दवा वितरण काउंटर संचालित हैं। मानकों के अनुसार, हर काउंटर पर कम से कम एक प्रशिक्षित फार्मासिस्ट की आवश्यकता होती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कुल कार्यरत फार्मासिस्टों की संख्या जरूरत से काफी कम है। विभिन्न रिपोर्टों और विभागीय अनुमानों के आधार पर राज्य में नए फार्मासिस्टों की भर्ती करने की आवश्यकता है।

सेवाएं समाप्त होने के संभावित दुष्परिणाम
इस पृष्ठभूमि में 599 संविदा फार्मासिस्टों को हटाना न केवल रिक्तियों को और बढ़ाएगा, बल्कि दवा वितरण व्यवस्था को लगभग ठप करने की स्थिति तक ले जा सकता है। कई अस्पतालों में पहले ही एक फार्मासिस्ट पर कई काउंटर संभालने का दबाव है, जिससे मरीजों को लंबी कतारों, देरी और कई बार गलत दवा वितरण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

स्थायीकरण पर सरकार की नीति पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि वर्षों से कार्यरत संविदा फार्मासिस्टों को स्थायी क्यों नहीं किया जा रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार वित्तीय भार और नियमित भर्ती प्रक्रियाओं की जटिलताओं के कारण संविदा व्यवस्था को बनाए रखना चाहती है, लेकिन यह नीति लंबे समय में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रही है। संविदा कर्मियों में नौकरी की असुरक्षा, कम वेतन और सीमित अधिकारों के कारण कार्य में स्थायित्व और जवाबदेही दोनों प्रभावित होते हैं।

कानूनी स्थिति: नर्सिंग कर्मियों की भूमिका
यहीं सबसे गंभीर और संवेदनशील प्रश्न खड़ा होता है। भारत में दवा वितरण को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानून Drugs and Cosmetics Act, 1940 तथा उससे जुड़े नियम Drugs and Cosmetics Rules, 1945 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करते हैं कि दवाओं का स्टोरेज, हैंडलिंग और वितरण एक पंजीकृत फार्मासिस्ट की निगरानी या उपस्थिति में ही होना चाहिए। साथ ही Pharmacy Act, 1948 के तहत केवल पंजीकृत फार्मासिस्ट ही औपचारिक रूप से दवा वितरण (डिस्पेंसिंग) के लिए अधिकृत माने जाते हैं।
इसका सीधा अर्थ यह है कि नर्सिंग स्टाफ (स्टाफ नर्स/ANM/GNM) का मुख्य कार्य मरीज की देखभाल और चिकित्सकीय निर्देशों का पालन करना है, न कि स्वतंत्र रूप से दवा वितरण करना। आपातकालीन परिस्थितियों में सीमित स्तर पर दवा देना अलग बात हो सकती है, लेकिन नियमित दवा काउंटर संचालन बिना फार्मासिस्ट के कराना नियमों के विरुद्ध माना जाता है।

ड्रग एक्ट के प्रावधान और सख्त वास्तविकता
उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों और नियमों के अनुसार, Drugs and Cosmetics Rules, 1945 Rule 64 दवाओं के भंडारण और वितरण के लिए निर्धारित योग्यताओं को स्पष्ट करता है, जबकि नियम 65(2) के अनुसार दवाओं का विक्रय एवं वितरण केवल योग्य एवं पंजीकृत फार्मासिस्ट की प्रत्यक्ष देखरेख में ही किया जाना अनिवार्य है। Pharmacy Council of India भी यह स्पष्ट करता है कि फार्मेसी शिक्षा एवं पंजीकरण के बिना कोई भी व्यक्ति दवा वितरण के लिए अधिकृत नहीं हो सकता।
औषधि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार भी यही स्थिति है कि दवा डिस्पेंसिंग के लिए केवल पंजीकृत फार्मासिस्ट ही वैध (valid) होता है—चाहे संस्थान सरकारी हो या निजी। आपातकालीन परिस्थितियों में सीमित रूप से नर्सिंग या पैरामेडिकल स्टाफ द्वारा दवा दी जा सकती है, लेकिन इसे नियमित व्यवस्था का विकल्प नहीं माना जा सकता। यदि नर्सिंग कर्मी दवा वितरण के लिए मान्य होते, तो निजी मेडिकल स्टोर्स पर भी नर्सिंग कर्मचारी दवा दुकान संचालित करते दिखाई देते, जबकि ऐसा किसी भी कानून के तहत मान्य नहीं है। यह तथ्य स्वयं इस बात को स्थापित करता है कि दवा वितरण एक विशिष्ट और विधिक रूप से संरक्षित कार्य है, जिसे केवल फार्मासिस्ट ही कर सकता है।

मरीजों पर सीधा प्रभाव
इस निर्णय का सीधा असर मरीजों पर पड़ना तय है। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में, जहां पहले से ही डॉक्टरों और स्टाफ की कमी है, वहां दवा काउंटर पर फार्मासिस्ट न होने से मरीजों को या तो बिना दवा लौटना पड़ेगा या फिर निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ेंगी। इससे सरकार की मुफ्त दवा योजना की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े होंगे।

भविष्य की चुनौती और निष्कर्ष
स्वास्थ्य व्यवस्था के जानकारों के अनुसार, यदि जल्द ही इन पदों पर पुनः नियुक्ति या स्थायी भर्ती नहीं की गई, तो आने वाले समय में सरकारी अस्पतालों में दवा वितरण प्रणाली के चरमराने का खतरा बढ़ जाएगा। यह स्थिति न केवल आम जनता के स्वास्थ्य अधिकारों को प्रभावित करेगी, बल्कि सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं की विश्वसनीयता को भी गंभीर नुकसान पहुंचाएगी। अंततः यह पूरा मामला राज्य सरकार की स्वास्थ्य नीति और मानव संसाधन प्रबंधन पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है—क्या सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के बजाय उन्हें कमजोर करने की दिशा में कदम उठा रही है?

चिकित्सा व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप
599 संविदा फार्मासिस्टों की सेवाएं समाप्त करने का निर्णय पूर्णतः अव्यावहारिक एवं जनहित के प्रतिकूल है। इस निर्णय से एक ओर सैकड़ों फार्मासिस्टों के सामने रोजगार का संकट उत्पन्न हुआ है, वहीं दूसरी ओर स्टाफ की कमी से दवा काउंटरों पर मरीजों की लंबी कतारें लग रही है, कार्यरत फार्मासिस्टों पर अत्यधिक कार्यभार पडने लगा है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है।
दीपक वर्मा, अध्यक्ष, जिला कांग्रेस कमेटी, कोटा (चिकित्सा प्रकोष्ठ)

Pramukh Samvad

ताजा खबरों को देखने के लिए प्रमुख संवाद से जुड़े

https://www.pramukhsamvad.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!