Written by : Sanjay kumar
कोटा, 18 जून। छात्र संवाद कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने छात्रों और उनके अभिभावकों से सीधे सवाल किए। इस दौरान करियर के दबाव, प्रतियोगी परीक्षाओं, आर्थिक बोझ, मानसिक तनाव और भविष्य को लेकर छात्रों के मन की बात खुलकर सामने आई।


“मुझे डॉक्टर या इंजीनियर नहीं, डांसर बनना था”
संवाद के दौरान राहुल गांधी ने एक छात्रा से पूछा कि यदि उसे पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ दिया जाता तो वह क्या बनना चाहती। इस पर छात्रा ने बेझिझक जवाब दिया कि उसका सपना डॉक्टर या इंजीनियर बनने का नहीं था, बल्कि वह एक डांसर बनना चाहती थी। छात्रा के इस जवाब ने शिक्षा व्यवस्था और समाज की अपेक्षाओं पर भी सवाल खड़े किए कि क्या युवाओं को अपनी पसंद का करियर चुनने की पूरी आजादी मिलती है।

“इंजीनियरिंग इसलिए चुनी ताकि बेहतर अवसर मिल सकें”
छात्रा सौम्या से राहुल गांधी ने पूछा कि उन्होंने इंजीनियरिंग का रास्ता क्यों चुना। इस पर सौम्या ने कहा कि इंजीनियरिंग उन्हें बेहतर एक्सपोजर और अवसर प्रदान कर सकती है। उन्होंने बताया कि आईआईटी दिल्ली और आईआईटी मुंबई जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई करने से करियर के कई नए रास्ते खुलते हैं और देश-विदेश में बेहतर संभावनाएं मिलती हैं।


“नीट पेपर लीक ने हमारी उम्मीदें तोड़ दीं”
नीट की तैयारी कर रहे छात्र हिमांशु डांगी से राहुल गांधी ने पूछा कि वह डॉक्टर क्यों बनना चाहते हैं। हिमांशु ने कहा कि डॉक्टर का पेशा केवल नौकरी नहीं बल्कि बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि किसी मरीज की जिंदगी डॉक्टर के हाथों में होती है। उन्होंने कहा कि इसी सोच के साथ वे डॉक्टर बनने का सपना देख रहे हैं।
हिमांशु ने नीट पेपर लीक का मुद्दा उठाते हुए कहा कि छात्र दो-दो और तीन-तीन साल तक कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन जब पेपर लीक जैसी घटनाएं होती हैं तो उनका विश्वास टूट जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं केवल परीक्षा को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि लाखों छात्रों के सपनों और भविष्य पर भी चोट पहुंचाती हैं।
“नीट की तैयारी में सालाना करीब चार लाख रुपये खर्च होते हैं”
जब राहुल गांधी ने नीट की तैयारी में आने वाले खर्च के बारे में पूछा तो हिमांशु ने बताया कि कोचिंग फीस ही करीब एक से डेढ़ लाख रुपये होती है। इसके अलावा हॉस्टल, भोजन, किताबें और अन्य खर्च मिलाकर एक छात्र पर सालाना लगभग चार लाख रुपये का खर्च आता है। उन्होंने कहा कि इतने बड़े खर्च के कारण कई परिवार आर्थिक दबाव झेलते हैं, लेकिन फिर भी अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं।
“यूपीएससी करके समाज के लिए नीतियां बनाना चाहती हूं”
संवाद के दौरान हंसवी नामक छात्रा ने कहा कि वह यूपीएससी परीक्षा पास कर प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहती हैं। उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य केवल सरकारी नौकरी पाना नहीं है, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर समाज के लिए काम करना है। उनका मानना है कि एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में वे लोगों की समस्याओं का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
एक परिवार की कहानी ने भावुक कर दिया माहौल
“बेटी का सपना पूरा करने के लिए मकान भी बेचना पड़े तो बेच देंगे”
राहुल गांधी ने भावना महावर के पिता नरेश से पूछा कि वे अपनी बेटी का सपना कैसे पूरा करेंगे। इस पर नरेश ने कहा कि वे मेडिकल सेक्टर में निजी नौकरी करते हैं और बड़ी मुश्किल से अपना घर बना पाए हैं। इसके बावजूद यदि बेटी के यूपीएससी के सपने को पूरा करने के लिए मकान बेचना पड़ा तो वे इसके लिए भी तैयार हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के सपनों से बड़ा उनके लिए कुछ नहीं है।
“खुद पर भरोसा है, लेकिन सिस्टम पर नहीं”
भावना महावर ने कहा कि माता-पिता के त्याग और संघर्ष को देखकर उन पर सफलता का दबाव बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी मेहनत और क्षमता पर पूरा विश्वास है, लेकिन कई बार व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर मन में आशंकाएं पैदा होती हैं। यही वजह है कि तैयारी के साथ-साथ भविष्य को लेकर चिंता भी बनी रहती है।
“रात में कई बार उठकर बेटी को देखते हैं”
भावना की मां पार्वती ने छात्रों के मानसिक तनाव का मुद्दा उठाते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बच्चे लगातार दबाव में रहते हैं। कोटा में समय-समय पर सामने आने वाली आत्महत्या की घटनाओं से अभिभावकों की चिंता और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि कई बार डर के कारण वे रात में दो-तीन बार उठकर अपनी बेटी को देखने जाती हैं। बेटी की चिंता में उनकी खुद की नींद तक उड़ गई है।
“सिर्फ पांच करियर विकल्प ही क्यों?”
इन संवादों के बाद राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि देश की शिक्षा व्यवस्था युवाओं को मुख्य रूप से डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, आईएएस और सेना जैसे सीमित विकल्पों तक ही क्यों बांध देती है। उन्होंने कहा कि युवाओं की प्रतिभा और रुचियां इससे कहीं अधिक व्यापक हैं, लेकिन व्यवस्था उन्हें सीमित रास्तों में ढालने का प्रयास करती है। उन्होंने पूछा कि क्या यह भी एक तरह की राजनीति नहीं है, जहां युवाओं के सपनों और संभावनाओं को सीमित कर दिया जाता है।
