Written by : Sanjay kumar
जयपुर, 25 अप्रैल। राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में लंबे समय से चली आ रही गंभीर अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाते हुए राजस्थान स्वास्थ्य विभाग ने 697 ऐसे सरकारी डॉक्टरों के खिलाफ बर्खास्तगी की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो वर्षों से बिना अनुमति के अनुपस्थित चल रहे हैं। ये सभी चिकित्सक सरकारी रिकॉर्ड में अब भी कार्यरत दर्शाए जा रहे थे, जिसके कारण संबंधित पदों को भरा हुआ मानकर नई नियुक्तियां नहीं की जा पा रही थीं और स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा असर पड़ रहा था।
🔹 697 डॉक्टरों का आंकड़ा जांच और डेटा संकलन
यह आंकड़ा किसी अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशालय स्तर पर की गई आधिकारिक विभागीय जांच और डेटा संकलन से सामने आया है। विभाग ने प्रदेश के सभी जिलों से अनुपस्थित डॉक्टरों की जानकारी मंगवाई और फिर एक समेकित सूची तैयार की, जिसमें कुल 697 डॉक्टर चिन्हित किए गए। यह सूची बाद में सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) को सत्यापन और कार्रवाई के लिए भेजी गई।
🔹 जांच में सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई
जिला स्तर से प्राप्त रिपोर्टों और रिकॉर्ड खंगालने पर सामने आया कि इन डॉक्टरों में कई ऐसे हैं जो एक दशक से अधिक समय से सेवा से गायब हैं, जबकि कुछ मामलों में अनुपस्थिति की अवधि 15 से 20 वर्षों तक पहुंच गई है। कई डॉक्टर ट्रांसफर के बाद जॉइन ही नहीं हुए या पीजी के बाद वापस सरकारी सेवा में लौटे ही नहीं।
🔹 स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा प्रभाव
इन अनुपस्थित डॉक्टरों में स्त्री रोग, बाल रोग, सर्जरी, रेडियोलॉजी और जनरल मेडिसिन जैसे महत्वपूर्ण विभागों के विशेषज्ञ शामिल हैं। इनके गायब रहने से सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी हो गई, जिससे मरीजों को लंबा इंतजार और अधूरी चिकित्सा सेवाओं का सामना करना पड़ा।
🔹 संरचनात्मक कमी और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
राज्य में पहले से ही डॉक्टरों की कमी एक बड़ी चुनौती रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत सुधार प्रयासों के बावजूद विशेषज्ञों की उपलब्धता सीमित रही है। ऐसे में “कागजी रूप से तैनात लेकिन वास्तविक रूप से अनुपस्थित” डॉक्टरों की समस्या ने स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियों को और उजागर कर दिया है।
🔹 नोटिस के बाद अब सख्त कदम
स्वास्थ्य विभाग ने पहले इन सभी डॉक्टरों को नोटिस जारी किए थे, लेकिन अधिकांश ने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद अब सेवा समाप्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सभी CMHO को निर्देश दिया गया है कि वे पांच दिनों के भीतर इन मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव भेजें और प्रत्येक डॉक्टर की स्थिति स्पष्ट करें।
🔹 बॉन्ड तोड़ने वालों पर आर्थिक कार्रवाई
इसके अलावा, उन डॉक्टरों के खिलाफ वसूली की कार्रवाई भी प्रस्तावित है जिन्होंने सरकारी कोटे से पीजी शिक्षा प्राप्त करने के बाद अनिवार्य सेवा (बॉन्ड) पूरी नहीं की। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि कई डॉक्टर निजी अस्पतालों में कार्यरत हैं, अपने क्लिनिक चला रहे हैं या विदेश में कार्यरत हैं।
🔹 सिस्टम सुधार की दिशा में बड़ा कदम
इस कार्रवाई को केवल अनुशासनात्मक कदम नहीं, बल्कि एक व्यापक सिस्टम सुधार अभियान के रूप में देखा जा रहा है। विभाग अब भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग, बायोमेट्रिक उपस्थिति और नियमित ऑडिट जैसे उपाय लागू करने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही, इन पदों को रिक्त घोषित कर नई भर्ती प्रक्रिया को तेज करने की तैयारी भी की जा रही है।
🔹 भविष्य की दिशा और विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई स्वास्थ्य प्रशासन में जवाबदेही स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसे लगातार और पारदर्शी तरीके से लागू किया गया, तो यह न केवल राजस्थान बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में जनता का विश्वास मजबूत कर सकता है।
