Written by : Sanjay kumar
जयपुर, 25 मई 2026। राजस्थान में स्वास्थ्य व्यवस्था पर अब सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक सवाल खड़ा हो गया है—क्या जनता को इलाज के नाम पर दवा दी जा रही है या बीमारी के साथ मौत का जोखिम? औषधि नियंत्रण विभाग की जांच रिपोर्ट ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह सिर्फ चौंकाने वाली नहीं बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
बीते सात महीनों की जांच रिपोर्ट में सामने आया कि 133 ब्रांडेड दवाएं और कॉस्मेटिक उत्पाद जांच में फेल पाए गए, जबकि तीन वर्षों में 217 दवाओं को “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” घोषित किया गया, जिनमें 25 नमूने नकली (स्प्यूरियस) पाए गए। अक्टूबर 2025 से 15 मई 2026 तक 150 दवाएं और कॉस्मेटिक उत्पाद जांच में फेल घोषित किए गए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन दवाओं को लोग भरोसे और अधिक कीमत देकर खरीद रहे थे, उन्हीं में इलाज करने वाले सक्रिय तत्व या तो बेहद कम पाए गए या कई मामलों में पूरी तरह गायब मिले। सवाल यह है कि यदि दवा में दवा ही नहीं, तो बाजार में आखिर बिक क्या रहा था?
जांच में जिन दवाओं और श्रेणियों के नमूने फेल पाए गए, उनमें प्रमुख रूप से—
- विनसेट-एल (Vincet-L)
- किलमेड 625 एलबी (Kilmed 625 LB)
- मल्टीविटामिन टैबलेट
- एलर्जी की दवाएं
- एंटीबायोटिक दवाएं
- खांसी की दवाएं
- एसिडिटी की दवाएं
- दर्द निवारक दवाएं
- डिप्रेशन की दवाएं
- बच्चों की दवाएं
जांच में सामने आया कि एक एलर्जी की दवा में इलाज करने वाला सक्रिय तत्व शून्य पाया गया। एक एंटीबायोटिक दवा में क्लेव्यूलैनिक एसिड अनुपस्थित मिला, जबकि मल्टीविटामिन टैबलेट में आवश्यक विटामिन-डी मानकों से कम पाया गया। ये केवल तकनीकी त्रुटियां नहीं बल्कि सीधे जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा खतरा हैं।
रिपोर्ट के अनुसार जयपुर, बद्दी, देहरादून, हरिद्वार, पालघर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश से संबंधित कंपनियों के उत्पाद जांच के दायरे में आए।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
राजस्थान के शहरों और कस्बों में बड़ी संख्या में ऐसी मेडिकल दुकानें संचालित होने की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं, जहां सिर्फ रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट का लाइसेंस टंगा होता है, लेकिन स्वयं लाइसेंसधारी फार्मासिस्ट मौके पर मौजूद नहीं रहता। दवा बेचने का काम ऐसे लोग कर रहे हैं जिन्हें दवाओं की संरचना, उनके दुष्प्रभाव, बायोकेमिस्ट्री और उपयोग की मूलभूत जानकारी तक नहीं होती।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है:
क्या चिकित्सा व्यवस्था में “लाइसेंस किराये पर” मॉडल चल रहा है?
क्या औषधि विभाग नियमित निरीक्षण करता है?
यदि करता है तो बिना फार्मासिस्ट के चल रही दुकानें बंद क्यों नहीं होतीं?
यदि नहीं करता, तो इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
और सबसे गंभीर सवाल—क्या इन अवैध व्यवस्थाओं को किसी स्तर पर संरक्षण तो नहीं मिल रहा?
दिसंबर 2025 में जयपुर की एक फर्म पर कार्रवाई के दौरान 3.73 करोड़ रुपए की नकली और अमानक दवाएं जब्त की गईं। जांच में सामने आया कि संबंधित फर्म बिना वैध लाइसेंस के कारोबार में शामिल थी।
इन मामलों में न्यायिक कार्रवाई भी हुई और कई लोगों को सजा मिली—
- लोकेश चंचलानी — 3 वर्ष कारावास, 1 लाख रुपए जुर्माना
- दुर्गा मेडिकल एजेंसी — 1 वर्ष कारावास, 20 हजार रुपए जुर्माना
- प्रेम लालवानी — 3 वर्ष कारावास, 50 हजार रुपए जुर्माना
- हनुमान खंडेलवाल — 3 वर्ष कारावास, 10 हजार रुपए जुर्माना
औषधि नियंत्रक अजय फाटक के अनुसार, “विभाग की ओर से निजी दवा बाजार से लगातार सैंपल उठाए जाते हैं। अमानक और नकली दवा के नमूनों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर ड्रग अलर्ट जारी किया जाता है। इसके बाद इन पर विधिक कार्यवाही चलती है।”
हालांकि अब जनता यह भी जानना चाहती है कि जब विभाग स्वयं लगातार ड्रग अलर्ट जारी कर रहा है, तब इतने बड़े स्तर पर नकली और अमानक दवाएं बाजार तक पहुंच कैसे रही हैं?
स्वास्थ्य विभाग, चिकित्सा मंत्रालय और औषधि नियंत्रण विभाग से जनता जवाब चाहती है:
- बिना फार्मासिस्ट के संचालित मेडिकल दुकानों की राज्यव्यापी जांच कब होगी?
- कितनी दुकानों के लाइसेंस निरस्त किए गए?
- नकली और अमानक दवाओं के नेटवर्क पर अब तक कितने बड़े स्तर पर कार्रवाई हुई?
- क्या सभी जिलों में विशेष अभियान चलाकर मेडिकल स्टोरों की वास्तविक स्थिति जांची जाएगी?
- क्या ड्रग इंस्पेक्शन रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएगी?
दवा सिर्फ व्यापार नहीं, जीवन का प्रश्न है। यदि इलाज के नाम पर बाजार में नकली दवाएं और अवैध रूप से संचालित दुकानें चलती रहीं तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य और विश्वास के साथ खिलवाड़ माना जाएगा।
अब समय आ गया है कि जिम्मेदार विभाग जवाब दे—आखिर जनता की सेहत की निगरानी कौन कर रहा है?
