Written by : Sanjay kumar
जयपुर, 26 मई। राजस्थान की राजनीति में पिछले एक वर्ष से चला आ रहा पंचायत और निकाय चुनाव का सबसे बड़ा सस्पेंस अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने अवमानना याचिकाएं खारिज कर सरकार को तत्काल राहत तो दे दी, लेकिन साथ ही 31 जुलाई 2026 तक हर हाल में चुनाव कराने का आदेश बरकरार रखते हुए साफ संकेत दे दिया कि अब बहानों की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति, प्रशासनिक मशीनरी और गांव-शहर की चौपालों में चुनावी हलचल अचानक तेज हो गई है। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक अब अपनी-अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गया है।
राहत भी मिली, दबाव भी बढ़ा
हाईकोर्ट ने माना कि चुनावों में देरी सरकार की जानबूझकर अवहेलना नहीं थी, बल्कि ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट और परिसीमन जैसी प्रशासनिक बाधाओं के कारण समयसीमा प्रभावित हुई। लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब 31 जुलाई अंतिम सीमा है।
यानी सरकार अवमानना से तो बच गई, पर चुनाव कराने की जिम्मेदारी अब और भारी हो गई है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह फैसला सरकार के लिए “राहत कम और चेतावनी ज्यादा” है।
40–50 दिन में कैसे होगा इतना बड़ा चुनाव?
निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय की है। सामान्य परिस्थितियों में पंचायत और निकाय चुनाव की प्रक्रिया करीब तीन महीने तक चलती है, लेकिन अब प्रशासन के पास लगभग डेढ़ माह का समय ही बचा है।
मुख्य चुनौतियां:
• प्रदेशभर में मतदान के लिए करीब 1.5 लाख सुरक्षा कर्मियों की जरूरत
• उपलब्ध बल लगभग 80 हजार
• परिसीमन और सीमांकन प्रक्रिया पूरी करना
• अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करना
• ओबीसी आरक्षण पर अंतिम निर्णय लेना
सूत्रों के अनुसार प्रशासनिक हलकों में तैयारी को लेकर अंदरूनी बैठकों का दौर तेज हो गया है।
असली राजनीतिक पेंच: ओबीसी आरक्षण
पूरा मामला सिर्फ चुनावी कैलेंडर का नहीं बल्कि ओबीसी सीटों के आरक्षण का भी माना जा रहा है।
हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि यदि आयोग समय पर रिपोर्ट नहीं देता तो निर्वाचन आयोग सामान्य सीटों के आधार पर भी चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
यही वह बिंदु है जिसने सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा हलचल पैदा कर दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोई भी दल ओबीसी समीकरण को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा, क्योंकि पंचायत और निकाय चुनावों की जड़ में जातीय और सामाजिक समीकरण सबसे मजबूत भूमिका निभाते हैं।
पर्दे के पीछे शुरू हो चुकी चुनावी बिसात
भले ही चुनाव की औपचारिक घोषणा नहीं हुई हो, लेकिन राजनीतिक दल अब पूरी तरह मैदान में उतर चुके हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की “ग्राम विकास चौपाल” और “रात्रि विश्राम” रणनीति को सीधे पंचायत चुनाव की तैयारी माना जा रहा है।
प्रदेश के कई जिलों में मुख्यमंत्री ग्रामीण चौपालों में पहुंचकर जनता से संवाद कर रहे हैं। वहीं भाजपा संगठन भी बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने में लगा हुआ है।
दूसरी ओर कांग्रेस और स्थानीय विपक्षी नेता भी सरकार पर चुनाव टालने और प्रशासनिक तैयारी में देरी के आरोप लगाकर माहौल बनाने में जुट गए हैं।
जनता की प्रतिक्रिया: विकास या राजनीति?
गांवों और छोटे शहरों में जनता की राय दो हिस्सों में बंटी दिखाई दे रही है।
एक वर्ग का कहना है कि चुनाव जल्द होने चाहिए क्योंकि स्थानीय निकाय और पंचायतें लंबे समय से अनिश्चितता में हैं और विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि जल्दबाजी में चुनाव कराने से परिसीमन, आरक्षण और मतदाता सूची जैसी प्रक्रियाओं में विवाद पैदा हो सकते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि आखिर चुनाव टले क्यों और अब इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है।
अब आगे क्या?
अगले 20–25 दिन राजस्थान की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं।
यदि ओबीसी आयोग समय पर रिपोर्ट देता है और प्रशासनिक तैयारियां पटरी पर आती हैं तो जुलाई में चुनावी बिगुल बज सकता है। लेकिन यदि कहीं भी प्रक्रिया अटकती है तो राजनीतिक बहस और कानूनी लड़ाई फिर तेज हो सकती है।
फिलहाल इतना तय है कि हाईकोर्ट ने 31 जुलाई की जो लक्ष्मण रेखा खींची है, उसके भीतर अब राजस्थान की राजनीति, सरकार और चुनाव आयोग—तीनों को अपनी परीक्षा देनी होगी।
