Written by : Sanjay kumar
कागजों में उगे जंगल, जमीन पर गायब हरियाली?
जयपुर, 4 जून। राजस्थान में पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के नाम पर वर्षों से चल रहे पौधारोपण अभियानों पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिन योजनाओं का उद्देश्य प्रदेश में वन क्षेत्र बढ़ाना, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करना और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना था, उन्हीं योजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं और फर्जीवाड़े की परतें खुलने लगी हैं।
वन विभाग के रिकॉर्ड में हजारों-लाखों पौधे लगाए जाने, उनकी सुरक्षा, सिंचाई और पांच वर्षों तक रखरखाव पर करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा किया गया, लेकिन कई स्थानों पर वास्तविक स्थिति इन दावों से मेल नहीं खाती दिखाई दे रही है।
सूत्रों और प्रारंभिक जांच रिपोर्टों के अनुसार करौली, बांसवाड़ा, झालावाड़, कोटा, बाड़मेर, जैसलमेर, भीलवाड़ा, जालौर, सिरोही, डूंगरपुर, अजमेर और चूरू सहित कई जिलों में पौधारोपण कार्यों की सत्यता जांच के दायरे में आई है।
कहां से शुरू हुआ शक?
वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा तक जब पौधारोपण कार्यों में गड़बड़ियों की शिकायतें पहुंचीं तो विभागीय स्तर पर जांच शुरू कराई गई। जांच के दौरान कई ऐसे स्थलों की पहचान हुई जहां रिकॉर्ड में पौधारोपण दर्शाया गया था, लेकिन मौके पर अपेक्षित संख्या में पौधे नहीं मिले।
बताया जाता है कि कुछ मामलों में न तो गड्ढे खोदे गए, न पौधे लगाए गए और न ही रखरखाव का कोई ठोस प्रमाण मिला, जबकि भुगतान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।
कैसे किया जाता है ऐसा फर्जीवाड़ा?
वन और पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार यदि पौधारोपण योजनाओं में भ्रष्टाचार होता है तो उसका तरीका सामान्यतः कुछ इस प्रकार हो सकता है—
- कागजी पौधारोपण
रिकॉर्ड में हजारों पौधे लगाने की प्रविष्टि कर दी जाती है, जबकि जमीन पर वास्तविक पौधारोपण नहीं होता।
- फर्जी खरीद
नर्सरियों से पौधे खरीदने, परिवहन और वितरण के बिल तैयार कर भुगतान उठा लिया जाता है।
- मृत पौधों को जीवित दिखाना
पौधों के सूख जाने के बाद भी उन्हें जीवित बताकर रखरखाव मद में राशि निकाली जाती है।
- फोटो और लोकेशन का खेल
एक ही स्थान या पौधारोपण स्थल की तस्वीरों का बार-बार उपयोग कर प्रगति रिपोर्ट तैयार की जाती है।
- सर्वाइवल रेट बढ़ाकर दिखाना
जहां 20 प्रतिशत पौधे बचे हों, वहां 70 से 80 प्रतिशत जीवित पौधों का दावा किया जाता है।
- कागजी निरीक्षण
निरीक्षण रिपोर्टें कार्यालयों में तैयार हो जाती हैं, जबकि वास्तविक स्थल सत्यापन सीमित रहता है।
क्यों आसान था यह खेल?
विशेषज्ञों का कहना है कि पौधारोपण योजनाएं अक्सर दूरस्थ वन क्षेत्रों, पहाड़ी इलाकों और ग्रामीण अंचलों में संचालित होती हैं। ऐसे क्षेत्रों में आम नागरिक के लिए निगरानी करना कठिन होता है।
यही कारण है कि वर्षों तक आंकड़ों और वास्तविकता के बीच का अंतर आसानी से छिपा रह सकता है।
एक पौधे पर पांच साल तक खर्च
वन विभाग की कार्यप्रणाली के अनुसार किसी पौधे पर केवल रोपण ही नहीं बल्कि पांच वर्षों तक रखरखाव के लिए बजट स्वीकृत किया जाता है।
- प्रथम वर्ष: गड्ढे, ट्रेंच, माइक्रोप्लान और पौध तैयार करना।
- द्वितीय वर्ष: पौधारोपण और परिवहन।
- तृतीय वर्ष: रखरखाव एवं रिप्लांटेशन।
- चतुर्थ वर्ष: सुरक्षा और संरक्षण।
- पंचम वर्ष: निगरानी और जीवित पौधों का संरक्षण।
यानी यदि पौधा जमीन पर लगाया ही नहीं गया तो पूरे पांच वर्षीय बजट पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
जांच में कौन कर रहा नेतृत्व?
विभागीय सूत्रों के अनुसार अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक उदयशंकर के नेतृत्व में जांच आगे बढ़ रही है। कई मामलों में रिकॉर्ड, भुगतान, पौधों की खरीद, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट और भौतिक सत्यापन का मिलान किया जा रहा है।
जांच का दायरा केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृतियों की श्रृंखला को भी खंगाला जा रहा है।
कौन-कौन हो सकते हैं जिम्मेदार?
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी केवल एक स्तर तक सीमित नहीं रह सकती।
जांच एजेंसियां निम्न स्तरों की भूमिका की पड़ताल कर सकती हैं—
- कार्य स्वीकृत करने वाले अधिकारी
- फील्ड निरीक्षण करने वाले अधिकारी
- भुगतान पारित करने वाले अधिकारी
- संबंधित ठेकेदार
- नर्सरी आपूर्तिकर्ता
- निगरानी तंत्र से जुड़े कर्मचारी
सरकार ने क्यों बदली व्यवस्था?
लगातार सामने आ रही शिकायतों के बाद वन विभाग ने अब डिजिटल निगरानी व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
नई व्यवस्था में—
- प्रत्येक पौधे की जियो-टैगिंग,
- जीआईएस आधारित लोकेशन ट्रैकिंग,
- फोटो आधारित सत्यापन,
- डिजिटल मैपिंग,
- एआई आधारित मॉनिटरिंग,
- “हरियालो ऐप” पर नियमित अपडेट,
जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं ताकि भविष्य में कागजी पौधारोपण की संभावना कम हो सके।
सबसे बड़ा सवाल
यदि रिकॉर्ड में जंगल उग आए और जमीन पर हरियाली दिखाई नहीं दी, तो आखिर करोड़ों रुपये किसके पास पहुंचे?
यदि पौधे नहीं लगे, तो भुगतान किस आधार पर हुआ?
यदि पौधे सूख गए, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है?
और यदि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ, तो क्या केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी या निर्णय लेने वाली पूरी श्रृंखला जवाबदेह बनेगी?
जनता जवाब चाहती है
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा विषय है। यदि हरियाली के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि पर्यावरण के साथ भी गंभीर धोखा माना जाएगा।
अब निगाहें जांच के अंतिम निष्कर्षों पर हैं। जनता यह जानना चाहती है कि राजस्थान की धरती पर वास्तव में कितने पेड़ लगे और कितने केवल फाइलों में उगाए गए।
